"ए भय्या हम अकेले गाँव में थे,जो राहुल को वोट किये, उई हार गए । तो का अब ई हमारी मदद नही करेंगे । राहुल का जीते के ही साथी हैं, हारे के नही । " सच पूछिए आज सुबह सुबह मिलने आने वाले एक शख्स राम सरन के यह लफ्ज़ मेरे कान में पिघले सीसे की तरह उतर गए ।
काँग्रेस, सपा और आरजेडी के नेताओं,यह शब्द उनके हैं, जिन्होंने भयँकर आंधी में भी अपना धैर्य और साहस नही छोड़ा । यह लाखों में जो एक आध वोट तुम्हे मिले हैं, वह उनके लाखों वोटों के बराबर हैं, इनकी क़दर करो ।
यही नही जिन्होंने तुम्हे वोट नही दिया,जिन्होंने तुमपर रत्ती भर विश्वास नही दिखाया अगर वह परेशानी में हैं, तो उनके आँसू पोछना तब तक तुम्हारा कर्तव्य है, जबतक तुम मर नही जाते । सार्वजनिक जीवन को धरने वाला व्यक्ति चाहे सत्ता में हो या चाहे विपक्ष में हो,उसे जनता की सेवा से चूकना नही चाहिए । जनता की सेवा से चूका राजनेता,डाल से चूका बन्दर समान है, यह मत आने देना ।
मैं तुमसे कह रहा हूँ,जो गाँवो में,कस्बों में,शहरों में तुम्हे चुटकी भर भी वोट मिला है, उसके लिये तुम्हे लड़ना होगा । जिस विश्वास से लोगों ने तुम्हारे निशान के सामने का बटन दबाया था,उस विश्वास को तुम्हारी निराशा तोड़ डालेगी ।
जब तुम कहते हो कि जनता ने वोट धर्म और पाकिस्तान के लिए दिया था,अस्पताल और रोजगार के लिए तो नही, यक़ीन जानो बड़े अश्लील नज़र आते हो । यह देश है, जिसने तुम्हे भी सत्ता दी थी,कभी खुशी और कभी मायूसी तुमने भी दी थी । यही ने आज इनको सत्ता दी है, यह भी खुशी तो कभी मायूसी दे रहे हैं । इसमें तुम क्यों अपने कर्तव्य भूल रहे हो ।
मुझसे रोज़ ही कोई न कोई मिलने आता है । ऊपर जो अल्फ़ाज़ हैं, वह भी मिलने ही आया था,उसके लफ्ज़ मुझे डराते हैं कि कहीं वह यह न मान ले कि जिनको वोट दिया था, वह बेकार गया ।
लोकतंत्र में एक भी वोट,सिर्फ जिताऊ और हराऊ वोट नही होता बल्कि वह विश्वास का परचम होता है । राहुल गाँधी हों,अखिलेश यादव हों या फिर तेजस्वी,यह सब जो भी वोट पाएँ हैं, उन्हें उनकी रक्षा करनी ही होगी । उन्हें अपने कर्मो से यह दिखाना होगा कि वह हर कमज़ोर वक़्त में देश की जनता के साथ मज़बूती से खड़े हैं ।
विपक्ष के सभी छोटे बड़े कार्यकर्ता का धर्म है कि वह अपने इर्द गिर्द अपने होने का एहसास कराए । जिस गाँव, गली,कूचे में एक भी वोट मिला है, उसे उस गाँव गली कूचे की फिक्र में दिन रात एक करना होगा ।
मैं क्या हूँ, रत्तीभर भी तो कुछ नही,राजनैतिक होने का भरम मुझमे है नही,फिर भी इस दौर के हर मायूस इंसान की आंख पोछता हूँ, कन्धा देता हूँ रो लो,कहता हूं,सब गलतियां मेरे ऊपर डालकर,खुदको मुक्त करो । उनसे कहता हूँ, हवा का रुख और ज़मीन की जुम्बिश मैं नही पहचान सका । मैं अपने ही देश मे अपने ही भाइयों के दिलों की चाहत को नही समझ सका । गलती हो गई,अब नही होगी । अब मैं, तुम सबके साथ मिलकर देश की खुशहाली की नई सुबह लाने फिर लगूँगा ।
यह ट्वीट,यह पोस्ट,यह मैसेज,यह लेख केवल माध्यम भर हैं, मैं घर घर गली गली भटककर,सही रास्ता पाने की खोज में हूँ । मुझे मेरे लोग,मायूस अच्छे नही लगते ।
इठलाती सत्ता को रोज़ देखता हूँ, वह मेरी चुनौती हैं । गाँधी से सीखता हूँ, वह मेरा रास्ता हैं । मैं, ऊपर के शब्द दोबारा नही सुनना चाहता हूँ, इसलिए उस बूढ़े राम सरन के पीछे साय जैसा आखरी सांस तक खड़ा हूँ.....
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