पता नही कैसे तुम यह आहट सुन नही पा रहे हो।तुम्हे लगता है आजके नौजवान बेकार हैं।वोह मोबाईल और दूसरी चीजों में घुसे हुए हैं।आजका नौजवान तफ़रीह और अपने आप के सिवा किसी को नही देखता।हमे लगता है जो यह सोच रहे हैं उन्होंने यातो आँखे बन्द कर रखी हैं या वोह देखना नही चाहते।
आप हर तरफ देखिये नौजवानों के झुण्ड लड़ रहे हैं।ज़ुल्म के खिलाफ उनकी खुली बगावत चल रही है।बच्चों से लड़ने के लिए कैबिनेट मिनिस्टर से लेकर सड़क छाप गली के गुंडे तक लगे हुए हैं।हमारे पास अपना कोई लीडर नही है और न हम बनाना चाहते हैं।आप देखिये हर मुद्दे पर नौजवान सड़क पर है,उन नौजवानों में बुढ़ों से बेहतर समझ और लड़ने की झलक है।
निर्भया से नजीब तक देख डालिये हर तरफ नौजवान ही थे जो लड़ रहे थे।बूढ़े तो हमे अन्ना की तरह ठग कर निकल गए।हमे अच्छा लगता है की न हम लेफ्ट हैं और न राईट, हम एक सुक़ून भरे हिंदुस्तान के लिए लड़ रहें हैं।हमारे साथी जूझ रहें हैं।आपको राष्ट्रवाद की हिंचकिया आने लगी होंगी,आए कोई फ़र्क नही पड़ता।
निकम्मेपन को देखिये ज़रा जेएनयू,हैदराबाद यूनिवर्सिटी,बनारस यूनिवर्सटी,अलीगढ़ यूनिवर्सटी,जम्मू यूनिवर्सिटी,इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और अब दिल्ली यूनिवर्सिटी में जो माहौल बनाया गया उसका ज़िम्मेदार कौन है।सारी गलती बच्चों की है तो शासन कौन निकम्मा चला रहा है।लड़कियों पर हाथ उठ रहे हैं और कौन बेहिस बच्चियों को बचाने की बात कर रहा है।
अजब माहौल है,अपने बोलने के लिए भी लड़ना पर रहा है।उन लड़कियों को सलाम जो बिना डरे लड़ रही हैं।उन लड़को को सलाम जो घुटने नही टेक रहे हैं।उन लिखने वालो की कलम को सलाम जो लगातार ज़ुल्म और निरंकुशता के विरुद्ध लिख रहे हैं।आप उठकर देखिये हर तरफ नौजवान भिड़े हुए हैं।कोई नौजवान सड़क पर है तो कोई कलम से उसे लिख रहा है।मगर इतना दिल में बैठा लीजिये यह नौजवान बहुत बेहतर है।
एक बार ठंडे दिमाग से सोचियेगा वोह कौन लोग हैं जो राजनितिक पार्टियों के अलावा यूनिवर्सिटी के बच्चों से भी लड़ता है।आखिर वोह बच्चों से लड़कर क्या हासिल करना चाहते हैं।और हाँ यह जो झूठे आज़ादी के नारों के इलज़ाम से उनपर हमला करते हैं, ज़रा सी शर्म बाकि हो तो सारी यूनिवर्सिटी के झगड़ो के मुद्दों को दोबारा पढ़ना।हमे सियासत सिखाने मत चले आना,एक बार खुद के दिल में झाँकना और देखना क्या ऐसे हिंदुस्तान खूबसूरत बनेगा।
मायूस और टूटे हुए दिलों की बुनयाद पर कभी कोई देश मज़बूत नही हो सकता।देश की फ़िक्र हमे हैं इसलिए हम बेचैन हैं।नौजवानों की चीखें हमे बेताब करती हैं।पता नही कौन वोह नीरो वंशज के लोग हैं जो अपने बच्चों के दिलों के हाल को समझ नही पा रहे हैं।मेरा हर उस नौजवान के सामने सर झुक जाता है जो लिखकर,लड़कर,जूझकर देश की खूबसूरती बरकरार रखने के लिए लगा है।
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