Tuesday, August 29, 2017

ऐनी,इस्मत,फ़िराक़,ध्यानचंद और मैं

अगस्त बीत रहा है या कहें बीत चुका है।लोग कहीं बच्चों,कहीं बाढ़ तो कही रेलवे की तरफ देख अगस्त को कोस रहे हैं।मैं क्या कहूँ,मैं तो एक कमरे में बैठा हूँ।बिलकुल चौकोर कमरे में,जिसकी हर दीवार बिल्कुल बराबर है, संग सफ़ेद दीवारों के बीच में फर्श पर बैठा हूँ।फर्श धँस सा रहा है, लगता है मिटटी नरम हो रही है।मेरे इर्द गिर्द कुछ तस्वीरें बिखरी पड़ी हैं।

मैं एकटक उन तस्वीरों में ऐनी आपा को देखे जा रहा हूँ।चश्मा और घुंघराले बालों में गालों की झुर्रियां इब्ने सफी के नावेल की सफ सी लग रहीं हैं, जितना पढ़ो,उतना गहरा।अच्छा तो तुम ऐनी आपा को नही जाने,वही आग का दरिया वाली कुर्रतुल एन हैदर।अगस्त ने हमसे मेरी ऐनी आपा को भी तो वापिस लिया था।उनकी ज़िन्दगी में कितना दर्द था,मैं बार बार तस्वीर में वह दर्द ढूंढ रहा हूँ और वह उसमे मुस्कुराकर सब छुपा ले रहीं हैं।

दूसरी तरफ जो तस्वीर पड़ी है वोह लिहाफ वाली आपा की है।मेरी इस्मत आपा की,वह भी एकटक देख रहीं हैं जैसे अभी मेरे चेहरे पर पड़ा नक़ाब खींचकर उतार देंगी।जैसे लिहाफ उतारा था।इस्मत चुगताई भी तो अगस्त से जुड़ी हैं।ऐनी आपा इस महीने गई तो इस्मत आपा इसी महीने आई, ग़म और ख़ुशी को बैलेंस कर दिया दोनों ने,इस्मत हमे देख देख मंटो के जुमले उछाल रहीं हैं।

यह जो पीछे तस्वीर पड़ी है।यह वही गोरखपुर की है जहाँ बच्चे ख़ामोशी से परेड करते हुए जन्नत जा रहें हैं।हर जाता हुआ बच्चा इतनी बेहतरीन उर्दू की नज़्म पढ़ते जा रहें की जन्नत खुद नीचे उतर आना चाहती हैं।जन्नत के सरदार बच्चों की मासूमियत और दिमागी बुखार के बावजूद इतनी बेहतरीन जहनियत की वजह से चीख़ रहें हैं, यह फ़िराक़ की ज़मीन से आए हैं।यह फ़िराक़ की फसल हैं।देखो गोरखपुर से फ़िराक के तराने को पढ़ते यह बच्चों की टोली आ रही है।फ़िराक़ भी तो अगस्त से जुड़े हैं।

अगस्त में कुर्रतुल एन हैदर,इस्मत चुगताई,ध्यानचंद और फ़िराक़ गोरखपुरी से जुड़े दिन हैं।इनमे से किसी को नही देखा सिवाए कुर्रतुल एन हैदर के,यानि ऐनी आपा के,उनके बहुत से किस्से याद हैं।अगस्त बीतता रहा और हम ऐनी आपा को ही याद करते रहे मगर लिख नही सके।हमे लगा ऐनी आपा की ज़िन्दगी का दर्द अगस्त महीने में पैबस्त हो गया है।हर तरफ दर्द में बिखरे जिस्म हैं।हर जिस्म में ऐनी आपा हैं।नही लिख सका, वह बातें जो देखि थीं।नही कह सकता वह सब,जो ऐनी आपा छोड़ गईं।

खैर जाते जाते आप सबको एक साथ याद किया है।कितना कँजूस और असंवेदनशील हैं हम।थोड़े से लफ़्ज़ में बच्चों समेत आप सबको समेट दिया,क्या करें,बिना ख़ून की ज़मीन कम ही बची है।हर तरफ तो मौत बिखरी पड़ी है।सब आपसे मिलने को बेचैन हैं, तभी तो जल्दी जल्दी जा रहें हैं।हम जब तक नही जा रहें,तब तक यहीं,इसी कमरे में बतयाते रहिये।फ़िराक़ की नज़्म के माइने इस्मत बताएंगी,इस्मत की जली कुटी बातें कुर्रतुल और कुर्रतुल के लिए मैं हूँ न...

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