बच्चे वोट नही देते इसलिए उनकी फ़िक्र की ही क्यों जाए।रही बात बच्चों के अभिभावकों की तो यह भी नया नही है की कई सालों से मरते बच्चों के ही अभिभावक उन्हें चुनते आए हैं तो भला फ़िक्र क्यों की जाए।
"बच्चे पैदा करके लोग समझते हैं की उसे सरकार पाले।"बहुत लोग कहेंगे की इसमें गलत क्या कहा है।कुछ भी तो नहीं।बस एक बार यह बयान मुँह बदल कर देखिये।यह इनके अलावा किसी दूसरी पार्टी के नेता ने कहा होता तो आप हम जामा नोच डालते।याद है कुछ शिवराज पाटिल।जिन्हें सिर्फ दिनभर में चार बार कपड़े बदलने पर बर्खास्त होना पड़ा था।
वह मुर्ख सरकारे थीं शायद जो आपकी फ़र्ज़ी संवेदनशीलता पर अपने गृह मंत्री का इस्तीफा ले लेती थीं।वह महा मुर्ख थीं जो रेलवे के हादसे पर कुछ ही दिन पहले बने रेलवे मंत्री को बर्खास्त कर देती थीं।खैर मुझे भी कोई फ़र्क नही पड़ता,गोरखपुर में बच्चों के मरने का अफसोस बेहद है।दिल डूबा डूबा रहता है मगर क्या करें,वहीं के लोग ही तो इनको दशको से चुनते आए हैं।आज भी चुना है।कल भी चुनेंगे इसे आप लोकतान्त्रिक गुलामी भी कह सकते हैं।
ओह गॉड,यह सब मैं क्या लिख गया।मेरा काम तो यह लिखना है, यहाँ सब शाँति शाँति है... मुझे तो बच्चों की मौत से ज़्यादा फूलों की रस चूसती तितली पर लिखना है।मुझे राजनीति नही करनी होगी,मुझे तो शबरी के झूठे बेर के निशान ढूंढकर लिखने चाहिए।हाँ तो बच्चों स्वर्ग में तो मिल नही पाएँगे क्योंकि हम लोगों ने यहाँ तुम्हारे लिए नरक बना रखा है।नफ़रत के ड्रम के ड्रम भर रखें हैं।तो भला ऊपर तुम हमारे लिए क्या ख़ाक स्वर्ग के दरवाज़े खोलने दोगे।जब हम सब बड़े लोग,जिन्होंने तुम्हारी मौत को चुनने वालों को चुना था,नरक जा रहे होंगे,तो रोते हुए तुम ईश्वर से यह मत कहना की मेरे माँ बाप को जन्नत में भेज दें।
यक़ीन जानो ऊपर से नीचे तक शर्म से गड़ जाएँगे,हम सब।दूसरों का पता नही,मैं खुद दौड़कर नरक की आग में कूद जाऊँगा,जहाँ तुम्हारी मासूम सूरत नज़र न आए।तुम्हारी चीखें सुनाई न दें।तुम्हारे दर्द से तड़पते बदन दिखाई न दें।जन्नत में अगर पहुँचे तो सारी उम्र नज़रे झुका झुका कर रहना पड़ेगा,वह भी बच्चों से,यह कहाँ हमे मंज़ूर,हम तुम्हे पाल भले नही सकते मगर मार तो सकते हैं।मारने से सरकार को कोई नही रोक सकता,यही तो उसे आता है....
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