बड़ी सीधी सी बात है।दो रास्ते हैं धर्म या देश।धर्म को जनसख्या की ज़रूरत है देश को ढंग के नागरिक की चाह है।धर्म को बेतहाशा भीड़ चाहिए ताकि कटने मरने के बाद भी दो चार तो धर्म का झण्डा उठाने वाले रह जाए।देश को तरक्की मेहनत करने वाले और साथ लेकर चलने वाली सोच के नागरिक चाहिए।धर्म को घर घर बच्चों का ढेर और औरत को चूल्हे या बिस्तर पर चाहिए।देश को कम बच्चे और औरत को समान अधिकार के साथ पसन्द न पसन्द का अधिकार देना है।
अब देखिये आप कितने धार्मिक हैं।कितने देशप्रेमी हैं।दूसरों की गलतियों,कमियों को देखकर,अपने में वही कमियां,वही गलतियां भर लेने से आप धार्मिक ही हो सकते हैं देश प्रेमी तो नही।अभी तय किया जाना ज़रूरी है की हमारे लिए देश पहले है या धर्म।इन दो विकल्पों में ही तौलिये और चीज़ें बहकाएँगी।किसी की राय मत लीजिये।किसी से मत पूछिये।बस उठकर यह देखिये की आपका आजका कदम धर्म के लिए उठेगा या देश के लिए।आपका लीडर धार्मिक प्रचारक होगा या राष्ट्र को आगे ले जाएगा।आपका नेता धर्म की चाशनी लपेटेगा या मुल्क़ की बात करेगा।उसके राष्ट्रवाद के साथ यदि धर्म जुड़ा है तो वह क्षदम राष्ट्रवाद है।उनसे दूर रहो जो देश की बात करते करते अपने धर्म की चादर उढ़ाकर बेवक़ूफ़ बनाकर खुद मौज करते हैं।किसी वाद, किसी सोच,पार्टी,संगठन की तरफ मुँह मत कीजिये बस देखिये आजतक के आपके कदमो ने धर्म को सींचा है या देश को।बंटे हुए दिल,टुकड़ा टुकड़ा सोंच,ख़ून खराबे के बीच धर्म खूब फलता फूलता है मगर इसमें देश मायूस हो जाता है, वह पिछड़ जाता है।
यहाँ धर्म से किसी खास धर्म का ज़िक्र नही है, हर उस धर्म का ज़िक्र है जिसे लगता है की वह संकट में है।कोई धर्म तब तक संकट में नही हो सकता जबतक उसका ईश्वर कमज़ोर नही हो जाता।तो आपको और हमको उस ईश्वर की कमज़ोरी अगर दिखने लगे तो भाई उठा लो तलवार,निकाल लो त्रिशूल और कह दो कुपोषण से प्रभावित ईश्वर के लिए मैं ख़ून बहाउंगा।अगर यक़ीन है की ईश्वर कमज़ोर नही हो सकता तो सारे ड्रामे छोड़कर देश के लिए लगो।ईमानदार बनो ताकि देश में दीमक न लगे।सहयोग करो ताकि देश मज़बूत हो।मिलकर रहो ताकि दुश्मन को तुम्हारी एकता से डर लगे।मोहब्बत से रहो ताकि दुनिया तुम्हे मोहब्बत से देखे।
बच्चों की भीड़ लगाकर एक कमज़ोर देश के कन्धों पर भोंदा सा धर्म सिर्फ ठहाके लगा सकता है और कुछ नही।विकल्प दो हैं अभी भी की हमे देश आगे ले जाना है या धर्म।जिन्हें लगे की हमने उनके ही धर्म को टारगेट किया है तो वह मान लें की हाँ किया है।शीशा देखें की वह कट्टर धार्मिक हैं या राष्ट्रप्रेमी।देश पर धर्म की शॉल डालकर तरक्की के रास्ते बन्द करना तो और भी बड़ी बेवक़ूफ़ी है।धर्म से खुद का चरित्र सुधारिये और मोहब्बत से देश को संवारिए।बिना छींटाकशी,तंज,झगड़े,बहस, के बिनातय कीजिये की कदम किस ओर जाएँगे।
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