कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ...न मिलते है, न साथ चाय पीते हैं, न लड़ते हैं, न बहस होती है यहाँ तक बात भी तो नही होती है।फिर जब वह चले जाते हैं तो ज़िन्दगी में खालीपन सा क्यों आ जाता है।ऐसा कैसे लगता है की दिल के अंदर कोई फाँस सी लग गई हो।
फेसबुक पर ऊपर नीचे ऊँगली चलाते कितने दोस्त पन्नों की तरह पलटते जाते हैं।कितनो के नाम तो कितनो की तस्वीर तो कितनो के अल्फ़ाज़ ज़बरदस्ती दिमाग में पलथी मारकर बैठ जाते हैं।जब यह उठकर जाने लगते हैं तो इनकी होशियारी तो देखिये,पूरा दिल ओ दिमाग साथ ले जाने लगते हैं।जाते जाते सूखी आँखों को लबालब भरे तालाब में बदल यह पलट कर भी नही देखते।
मनोज पटेल चुपके से चले गए,सच कहें जो उनके अल्फाज़ो की चादर ओढ़ रात में सोया था,लगा कोई एक झटके में छीन ले गया।यहभी कितना अजीब है की बिला ज़रूरत वह चादर खुद बखुद उढ़ गई और खुद बखुद उड़ भी गई।मगर जब यह चादर हटी तो लगा की बचा ही क्या है अब हमारे पास।।अजब दर्द के मारे हम,पता नही कहाँ से मनोज पटेल के अल्फ़ाज़ टकरा गए और हमारे इर्द गिर्द फैल गए,क्या पता की रात की एक करवट से यह लफ़्ज़ टूट जाएँगे और इनके टूटने की आवाज़ भी न सुनाई देगी।आज मनोज ने दिल को ऐसा झटका दिया है की मेरे पास आने वाले अल्फ़ाज़ मुँह बाए खड़े हैं और कह रहें हैं की अगर तुम ज़िंदा रहो तो चौखट पर आएं वरना कहो तो यहीं से अलविदा।पता नही,मैं कुछ कह नही सकता,जबतक मैं मनोज को अलविदा बोलकर आता हूँ तबतक मेरा इंतज़ार करना......
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