बड़ी चहक के साथ आईना देखने का मन हुआ।सोचा की चलो आज अपने जिस्म को खुद देखूँ तो की इसमें क्या क्या खूबसूरती टकी हुई है।अपने ज़िंदा जिस्म को जीभर देखने की भी ललक अलग ही होती है, कुछ तो ऐसे होंगे जिन्होंने कभी अपने पूरे जिस्म को नही देखा होगा।उन्हें तो यह भी नही पता होगा की खाल कहाँ पर गहरे रँग में है और कहाँ हल्के रँग में,कहाँ सख़्त है और कहाँ मुलायम।यूँहीं तो मैं नही कहता की जिस्म को देखो और यह जानने की कोशिश करो की तुम कितना कम जानते हो।जो अपने जिस्म को ही नही जानता, पहचानता ,वह क्या किसी दूसरे को जानेगा,पहचानेगा।
खैर मैं अपने ज़िंदा जिस्म को खड़ा आईने के सामने देख रहा था,रह रह मुस्कुराहट आ जा रही थी की एकदम से अपने जिस्म में ही मुर्दा दिखने लगा।गौर से देखा तो गुलाबी परत चढ़ाए मेरा दिल अपने अंदर कितने मुर्दा जिस्म दफ़न किये है एक के बाद एक दिखने लगे।मेरी आँखे खुलती ही चली जा रही थीं इस क़दर मुर्दा लोगों को देख देख कर।
सोच में पड़ गया की हमारे ताज़ा ज़िंदा जिस्म में किस क़दर मुर्दा लोग दफ़न हैं।पता नही लोग क्यों कहते हैं की इंसान कब्रिस्तान में दफ़न होता है।श्मशान में जलाया जाता है।नदी में बहा दिया जाता है।यक़ीन करो,सब मेरे दिल में दफ़न हैं।मेरे दिल की गर्मी उनकी चिताओं की धधक है।दिल पर बिखरा पानी जो आँसुओं से कभी कभी निकल कर बाहर आ जाता है वह उन नदियों का पानी है, जिसमे लाश बह रहीं हैं।मैं बचपन से याद कर रहा हूँ की किस क़दर इंसान के लोथड़े मेरे ज़हन में दफ़न हैं।समन्दर किनारे लहरों में उलटे पड़े बच्चों की लाश दफ़न है।बाढ़ में बहती हर लाश मेरे ही दिल में तो दफ़न है।
केदारनाथ में कही दूर बह गए मेरे दोस्त राजीव सरन की लाश किसी को नही मिली,जबकि वह भी यहीं मेरे सीने में दफ़न है।कुछ लोग कहते हैं की एक एक कब्र से सत्तर सत्तर हज़ार मुर्दे निकलेंगे।हमे तो लगता है मेरी ही कब्र से अकेले एक कम सत्तर हज़ार निकलेंगे।सब तो सीने में दफ़न हैं।आईने में आँख से ज़्यादा सीना हो तो चमक रहा है, बिलकुल शीशे की तरह,तभी तो साफ़ सब साफ़ नज़र आ रहा है, एक दिन तुम भी इसी सीने में कहीं शॉल ओढ़े बैठे होगे,दोस्त....
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