Monday, December 25, 2017

दिलों का बंटवारा

सन् 47,जब देश बटा।हिन्दू और मुस्लिम दो जिस्म से दो ज़मीन के टुकड़ों में तब्दील होने लगे।तब हिंदुस्तान से पाकिस्तान जाती हुई भीड़ को एक शख्स की आवाज़ ने रोक लिया।वह जामा मस्जिद के दरवाज़े की टेक लगाकर जाते हुए लोगों को रोक रहा था और लोग उसी जगह रुक भी गए।वह खूबसूरत दिलों की भीड़ थी जिसने अपना नेता मौलाना आज़ाद जैसा चुना था।

सन् 2017 न देश नही बंटा है, दिल बंटे हैं।अब कोई नही है जो बंटे दिल को एक करे।जो एक कर रहा है, उसे गरियाया जा रहा।जो दिल जोड़ने की बात कर रहा वह दिलों का कांटा बना हुआ है।जो दिलों को बाँट रहा,वह दिलों पर राज कर रहा है।
हमारे पुरखे ज़मीन बंटने के बावजूद एक साथ मिलजुलकर तमाम तरक्कियों के रास्ते पार करते चले गए।अब जब ज़मीन का कोई हिस्सा बंट भी नही रहा तो हम एक दूसरे के दिलों को रौंदते हुए रोज़ नीचे गिरते चले जा रहें हैं।

यक़ीन जानो आज मौलाना आज़ाद जैसी शख्सियत होती तो यह उतावली भीड़ उन्हें धक्का देकर आगे बढ़ जाती।उनके पुरखों को ऐसी गालियों से नवाजती की उनकी कब्रें और धँस जाती।क्या हिन्दू क्या मुसलमान दोनों ने अपना स्तर इस हद तक गिरा लिया है की कोई सूरत सम्भलने की नज़र भी नही आ रही।किसी भी हिस्से को ज़रा भी तक़लीफ़ होती है तो वह सामने वाले हिस्से की तो बुराई करता ही है, साथ ही अपने यहाँ मौजूद अमन की बात करने वालों को भी ज़लील करता है।बड़े अच्छे तो मौलाना आज़ाद जैसे लोग जो उस दौर में होकर गुज़र गए।

अब तो हम ऐसे वक़्त में जी रहें हैं की खुद को ही अमन के लिए रोके रखें,तो ही बहुत है।अब लड़ाई अंदर बाहर हर तरफ है।एक तरफ सामने भीड़ पागल होती जा रही है तो दूसरी तरफ इधर खड़े लोग अपने ही लोगों के कुर्ते नोच रहें हैं की काहे वह अमन की बात कर रहें हैं।
इस दौर में भी जो सबको साथ लेकर चल रहा।जो सबकी आवाज़ सुन रहा।जो सबके लिए बेचैन है।जो सबको सुक़ून से देखना चाहता है।वह वाक़ई बीज है, जो आज नही तो कल दरख्त बनेगा।बाकि सब खर पतवार हैं, जो आज उगी हैं, तक़लीफ़ पहुचाएंगी मगर खत्म भी हो जाएँगी।मुल्क़ करवट लेगा,यक़ीन है

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