वह पहलवान रोज़ कसरत करता था।खूब वर्जिश करता,बदन में तेल चुपड़ता।उसका भारी भरकम बदन इधर उधर से बेखबर खूबसूरती से बढ़ रहा था।उसी के पड़ोस में एक दुबला पतला,उस पहलवान का चौथाई से भी कम एक इंसान था,वह भी कसरत करता था।ग़रीबी में तेल तो नही चुपड़ सकता था तो पहलवान से बचा हुआ तेल अपने इकहरे बदन पर मलता।कभी कभी अकड़ के वह दुबला इंसान पहलवान को अपने बदन की गांठो को दिखा देता था।पहलवान उसे देख मुस्कुरा देता।एक दूसरे से हल्के फुल्के मज़ाक के साथ दोनों ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे।
तभी पहलवान से मन्थरा टाइप पूरा गिरोह मिलता है।मन्थरा गैंग पहले भी आता था मगर पहलवान उन्हें अपनी चौखट भी नही चढ़ने देता था।आज शाम उसने इनको बैठने दिया।उसे उसी शाम मन्थरा गैंग समझाता है यह जो दुबला पतला इंसान है, यह तुम्हे कल पटकने की तैयारी कर रहा है।तुम जो मासूम से उसके साथ खड़े होकर मुस्कुरा रहे हो,यह इंसान तुम्हारी मुस्कान छीन लेगा।तुम क्या,तुम्हारी सन्तानो को भी नेस्तनाबूद कर देगा।यह तुम जिसे दुबला समझते हो,यह अंदर से तेज़ाब हैं।तुम ज़रा से चूके तो यह तुम्हे नोच नोच खा जाएँगे।
अगली सुबह रोज़ से अलग थी।पहलवान को देख जैसे ही वह दुबला इंसान मुस्कुराया,पहलवान उसपर झपट पड़ा।कमबख्त मुझसे लड़ने की तैयारी कर रहे हो।मुझपर हाथ डालने की तैयारी है।पहलवान ने उस दुबले पतले इंसान के उस हर अंग को खींचकर खोल दिया,जो हड्डियों के सहारे एक दूसरे से फंसे थे।वह इंसान कहता रहा,भाई किसने कहा की हम आपसे लड़ना चाहते हैं, हम तो सदियों से साथ थे,खाने से टूट रहे थे,मेरी पहली लड़ाई तो भूख से थी दोस्त,तुम कहाँ से आ गए।कहते कहते दुबले इंसान ने आखरी साँस ली।उधर पहलवान अपनी बाँह फुलाए, शाकाहारी से माँसाहारी हो गया।इस बार माँस जानवर का नही,इंसान का खाया गया...मन्थरा गैंग ठहाके मारकर हँसा, आज उसने फिर एक इंसान को लाश और दूसरे इंसान को ख़ूनी बना लिया था,मिशन जारी है...
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