बहुतों को यह तस्वीर उस फ़िल्म की दहलीज़ तक ले जाएगी जिन्होंने पिछले तीन महीनों उधेड़ बुन में गुज़ारे हैं।देश को हर छटे महीने जँग का मैदान बनते देखा है।अपने बेहतरीन लीडरों की ज़बानों से उगलती आग देखी है।यह तस्वीर कल के परिणाम से बहुत हद तक मिलती जुलती प्रतीत हुई।स्पार्टन और ज़रख्सीज़ जैसी टकराहट दोहराते देखा।
अब चुनाव,चुनाव रह ही कहाँ गए जहाँ नियम,नियत की बात की जाए।अब तो जँग के इस मैदान में या तो आपकी तलवार में धार हो या मज़बूत ढाल हो,तभी टिके रह सकते हैं।जब एक शक्तिशाली बादशाह से कोई कमज़ोर सेना भिड़ती है तो उसकी हार की भविष्यवाणी बच्चे भी कर सकते हैं।मगर जब वही सेना दाँतो में खटास ला दे तो वह काफी दिन तक याद किया जाता है।ज़रख्सीज़ ने भले 300 स्पार्टन्स को ज़मीदोज़ कर दिया हो मगर इतिहास ने उन स्पार्टन्स को ही सुनहरे अक्षर दिए हैं।खैर वह तो कहीं और की बात हुई।आप अपने चबूतरे पर लौट आइये।मुझे प्रधानमंत्री को देख यह ख़ुशी होती है की वह अंत तक जूझते हैं।जँग के मैदान में वह निर्मम और क्रूर होते हैं जैसे एक शक्तिशाली राजा को होना चाहिए।जँग के मैदान में मुरव्वत बेईमानी है और दाँव पेच पर ऊँगली उठाना कामचोरी है।अगर उनसे मुकाबला करना होगा तो आपको यातो उनसे ज़्यादा निर्मम और क्रूर होना होगा या फिर इसके ठीक विपरीत सौम्य,सरल होना होगा।जिन्हें लगता है यह चुनाव अब वैसे नही रहे जैसे पहले होते थे,वह गर्दन पलट कर देखें उनके इर्द गिर्द पहले सा रहा ही क्या है।वक़्त के साथ क़दम ताल बढ़ाएँ।जँग उसी दौर के हथियार से जीती जाती है, जिस दौर की हो।
प्रधानमन्त्री से सीखा जा सकता है की जीतना कितना महत्वपूर्ण है और इसके लिए किस हद तक जाया जा सकता है।राहुल गाँधी बेहतरीन ढाल बन चुके हैं।उन्होंने हर उस वार को बर्दाश्त कर लिया जो उनपर हुआ,अब बस हथियार चलाने की देरी है।आशा है एक बेहतरीन लड़ाई फिर होगी।मैं नैतिक स्तर विस्तर कुछ नही मानता।लचकदार हाथ में तलवार नही थमाई जाती।जब आप मैदान में हों तो खुलकर खिलकर मैदान में हों,यही रणक्षेत्र कहता है।दोनों दलों को बेहतरीन संघर्ष के लिए बधाई।एक मरकर जीता है तो दूसरा मारकर,जीत दोनों योद्धाओं की हुई है।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, December 18, 2017
300 राहुल मोदी
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hafeezkidwai
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