एक घर था। नही एक बच्चा था।नही बल्कि एक घर में बच्चा था।उस बच्चे के घर दरवाज़े के सामने नालियाँ थीं,जिन्हें पार करने की उसे सख़्त मनाही थी।वह घर के अंदर ही लेटा हुआ छत और दीवारों को देख लिखता रहा।दुनिया की सबसे खूबसूरत दीवार मेरी है।दुनिया की सबसे बड़ी छत मेरी है।दुनिया की सबसे खूबसूरत ज़मीन मेरा फर्श है।वक़्त बीतता रहा,उसके बच्चे हुए,वह भी नाली के पार नही गए।उन्होंने भी कहा दुनिया मेंसबसे समझदार मेरा बाप था।
दुनिया का सबसे क़ाबिल शख्स मैं हूँ।दुनिया के सबसे अच्छे खाने मेरे किचन के हैं।मेरी बहन सबसे पारसा है।मेरा भाई सबसे महान है।हमारे ही हाथों में सब कुछ है।जो हैं हम ही तो हैं, सर्वश्रेष्ठ।इस तरह उस घर में दुनिया सिमटती रही।
इत्तेफ़ाक़ से कई पुश्तों बाद उस घर के एक आध बच्चों ने नाली पार की और घर लौटकर कहा,नही भाई,दुनिया में हमारी छतों से भी बड़ी छते हैं।
हमारे किचन से अलग खाने भी हैं दुनिया में।हमारी दीवारों से ऊँची दीवार भी मौजूद हैं।दादा परदादा से भी अकलमन्द दूसरी गली के लोग हैं।हमारे भाई बहनो की तरह ज़्यादातर घर में लोग हैं।हमारे सिवा भी और लोग भी श्रेष्ठ हैं
इतना कहना भर था की घर में कोहराम मच गया।जिन नालियों को पार करना मना था,उन नालियों में घर के ही लोगों का ख़ून बहने लगा।देखो कब तक बहता है।
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