मुर्दा सर से पाँव तक एक जैसा ठंडा होता है।उसको एक जैसा ही पूरा कफ़न पहनाया जाता है।गौर से देखना तुम्हारे सामने पड़ी लाश एक जैसी चीज़ से ही तो ढकी है।उसमे से रँग नदारद है।लाल और हरा, नीला और काला ग़ायब है।क्योंकि सबको पता है यह जो अब ज़मीन में सड़ने जा रहा है, या लड़कियों में भुनने जा रहा है,इसे अब रँगो की ज़रूरत नही,इसे अब विभिन्नता की ज़रूरत नही।
ठीक वैसे ही जो समाज खुद को एक रँग,एक तरीके में ढकेल रहा है, उसे मालूम है वह समाज मुर्दा होने जा रहा है।उसके बाशिंदे घरों के अंदर सड़ने जा रहे हैं।शुरुआत दिमाग सड़ने से हो चुकी है।
जाओ एक रँग,एक सोच,एक धर्म,एक झण्डे के साथ मुर्दा बनने की तैयारी करो।लोग कन्धा देने को जुट चुके हैं।अब बस रँगो की लालच में,ज़माने की अलग अलग खुशबू की महक में अपने जिस्म से उठती कपूर की गन्ध को भूलकर उठ मत बैठना।
अब तुम बस सड़ ही जाओ,फुर्सत मिले।सड़े हुए दिमाग में दूसरी खुशबू भी तो बदबू ही लगेगी।जिस भी ज़मीन के टुकड़े को खुद को गू बनाना हो,वह दाल चावल रोटी सब्ज़ी के वजूद को अगली सुबह एक ही रँग,एक ही बदबू,एक ही जगह देख सकता है।इसलिए कहते हैं सबको अपनाओ,हर मज़े,हर रँग को करीब रखो ताकि बाग़ लगो नाकि शौचालय,गुलदस्ता लगो नाकि मुर्दा।
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