"छुप गए वो साज़-ए-हस्ती छेड़ कर
अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है।।"
गुज़री ठण्डी रात लखनऊ के लिए हमेशा के लिए के लिए ठण्डी हो जाएगी भला किसने सोचा था।हर एक कल रात उनके कंपकपाते होंटो से झड़ते शेर पर वाह वाह ही तो कर रहा था।हर फ़न पर दिल ओ जान से न्योछावर होने वाला शहर गहरी रात में ही तो अपनी बेरुखी का रँग दिखाता रहा है।
वह रात भला कैसे भूले जिसकी सुबह उजड़ी हुई हो।कल की रात खुले आसमान के नीचे, हमारी माटी का कीट्स दम तोड़ रहा था।
उनका हर एक कद्रदान अपने कम्बल में जा चुका था,अब उनके पास शायद सुनाने को नही बचा था,वरना फ़नकारों का भूखा यह शहर यूँ उनका दामन न छोड़ता।
असरारुल हक़ मजाज़ उर्फ़ मजाज़ लखनवी के हिस्से के लखनऊ ने ही तो कल की ठण्डी रात में सड़क किनारे मजाज़ को ऐसी गहरी नींद सुलाई की मजाज़ कभी नही जागे।आज मजाज़ के गुज़रे अरसा हो गया।उनकी कब्र पर फूल तो छोड़िये,झाँकने की भी कम फुर्सत है।
अच्छा हुआ मजाज़ को कम उम्र मिली।44 की उम्र में ही इस क़दर ज़हनी तक़लीफ़ सह ली,अपने इर्द गिर्द खड़े इंसानों को हिन्दू मुसलमान होकर ख़ून बहाते देख उनका दिमाग भी तो कई बार साथ चुका था और ज़िंदा रहते तो तक़लीफ़ ही तो होती और अगर आज होते तो रोज़ मरते।
मजाज़ की मौत,मजाज़ के लिए आज़ादी ही तो थी,वह आज़ादी जो आज मजाज़ को हमारे जैसे चाहने वाले रोज़ चाहते हैं।जब हिन्दू मुस्लिम के नाम पर दिलों को बंटता देखते हैं तो लगता है मेरे दिल को कोई अपने नुकीले नाखूनों से खुरच रहा हो और कमबख्त दिल रुकने का नाम भी नही ले रहा।जब जब मजाज़ से जुड़ा कुछ भी नज़र के सामने से दौड़ता है तो दिल में एक टीस सी उभर आती है।अजब दर्द होता है, काश मजाज़ जाते जाते उस हर दिल को भी लिए जाते जिसमे संवेदनाएँ हों...
मजाज़ आज कब्र में सुक़ून में हों या न हों मगर हमारे दिल में बड़े बेचैन से बैठे हैं।ऐ मजाज़ या तो मेरे दिल की आहट रोक दो या फिर अपनी बेचैनी,यूँ दिल में मजाज़ और धड़कन साथ साथ झेली नही जाती।याद तो रोज़ ही आती है।आज यौम ए वफ़ात में यह याद हल्की नमकीन पानी में भीगी हुई है दोस्त मजाज़।
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