इस बार हमने दीपावली अपने उस्ताद सँग मनाई । रौशनी का त्यौहार,अँधेरी ज़िन्दगी में रौशनी दिखाने वाले के साथ,यानि हज़रत निज़ामुद्दीन की दरगाह पर । तीन दिन रहे,लोगों को आते जाते देखा,उठते बैठते देखा,सोते,जागते देखा,यहाँ ही तो भारत बसता है दिखलाई देता है ।
जब कोई नफरत की बात करता है, जब कोई।दो धर्म के बीच तकरार करता है, मेरा मन करता है कि इसके सीने में मैं हाथ उतारकर,दिल निकाल लूँ और उसे साफ पानी से धोकर,उसका सारा मैल धो दूँ, फिर उसका दिल उसके सीने में पवित्र करके लगा दूँ, ताकि उसे एहसास हो कि वह इंसान है, हैवान नही,इंसान जोड़ने का नाम है, हैवान तोड़ने का नाम है ।
मैं चाहता हूँ मस्जिदों में चिराग जलें, मंदिरों में सिवई बंटे, यह तो इतना मुश्किल भी नही,बस दिल ही तो बड़ा करना है । निज़ामुद्दीन की दरगाह पर जो चिराग जलाए गए,यकीनन उससे खुदा मुस्कुराए होंगे। हमारी "लिंचिंग और हिंसा मुक्त भारत यात्रा" के यूपी के एक गाँव मे पड़ाव पर,मां काली के मंदिर में पुजारी ने फैसल भाई और यात्रियों को नमाज़ पढ़ने की जगह दी,तो यकीनन उससे भगवान प्रसन्न ही हुए होंगे । कौन ईश्वर है, जो चाहता है कि उसके मानने वालों के दिल छोटे और नफरत भरे हों,कोई तो नही...
बहुत अरसे से दिल मे एक ख्वाहिश थी कि कभी तो दीपावली अपने उस्ताद सँग मनाया जाए । हज़रत निज़ामुद्दीन और अमीर ख़ुसरो के बीच बैठकर मैं रौशनी ही तो निहारता रहा,सिर्फ यह सोचकर कि मेरे दिल का सारा अंधियारा मिट जाए और मैं भी मैं न रहकर कुछ भी न रह जाऊं । इस बार की दीपावली,जिसको मेरी आँखों ने देखा,दिल ने महसूस किया,बिल्कुल ही अलहदा दीवाली रही,सब चिराग बाहर जला रहे थे,लपक लपक,बेलौस मोहब्बत से जला रहे थे,मैं अपने अन्दर चिराग जला भी रहा था और बुझा भी,क्योकी हर बुझाने में कोई बार बार आ रहा था,उस चिराग को जलाने,उसका आना ही तो मेरा मैं से मिटकर सिफर हो जाना है.....
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