Friday, October 11, 2019

उमराव और तरक्की

कल रात उमराव आई थीं।पूछ रहीं थी लखनऊ की शाम अब कैसी होती है।हमने भी कहा,अरे वाह, जाते जाते खुद ही सारी शाम अपने साथ लेती गईं और अब पूछ रहीं हैं की शाम कैसी होती है।
अरे उमराव आपके जाते ही लखनऊ ने सिर्फ सबेरा ही देखा है।हमारे हिस्से की शाम का सुरमई अँधेरा तो आपने अपनी कब्र में क़ैद कर रखा है।हम रोज़ सुबह उठते हैं और अब दिन रात अपनी सुबह ही बनाने में लगे रहते हैं।

हमे रोज़ अव्वल आने के लिए लड़ना पड़ता है।ए उमराव इस जीतने की दौड़ में हम सबकी शाम खो गई है।गोमती का पानी छुए अरसा हुआ है,अगर हो सके तो उमराव हमारी वह शाम लौटा दो,जो तुम्हारी आँखों से होते हुए,जिस्म की किसी सिलवटों में कहीं खो गई है।

आखरीबार जब उस रोज़, सरे शाम जब तुमने अपने नाज़ुक हाथों बेदर्दी से चराग़ बुझाया था,तो किसे पता था की यह हमारी मुस्कुराहट पर तुमने हाथ रख दिया है। वह जो दीये की लौ लहलहाती हुई तुम्हारी उँगलियों से टकराकर तड़पती हुई बुझ गई थी,हमें क्या पता था यह मेरे दिल के सुक़ून की मौत है ।उस रोज़ बिखरने वाला अँधियारा हम सबपर रौशनी बनकर तारी हो गया है। हमारी आँखे बेहियायी से खुली बस अपने अपने लिए चीजें समेटने लगीं । अब हमें किसी के पाँव की थपकी,किसी के गले से गूंजते सुर,किसी की सियाही में डूबते उतराते अल्फ़ाज़ ,बिल्कुल भी नही खींचते । हम सब तरक्की की दौड़ में हैं ।

उमराव इस दौड़ में हमारे पास हमारे अपने लिए वक़्त नही है, बताओ इस लखनऊ की शाम देखें या हमारी किस्मत में ज़बरदस्ती टांक दिया गया तरक्की का सवेरा देखें । हम चौंध्यायी आँखों से बिना देखे भाग रहे है ।हो सके तो हमे थोड़ा ठहरना बतला दो उमराव,हम अब भागते भागते ठहरना भूल चुके हैं । तरक़्क़ी जो कभी पूरी हुई नही,इसमे बौराए हुए हम घुल रहें हैं, दोस्त....

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