मैंने रात रात टहलते देखा है, जब बच्चे को तक़लीफ़ थी।अस्पताल में पर्चे की लाइन लगे देखा।स्कूल में एडमिशन फॉर्म की लाइन।लगे देखा।ज़ू में टिकट के लिए लाइन लगे देखा।ट्रेन में रिज़र्वेशन की लाइन लगे देखा।यही नही इन सबके लिए सुबह से शाम जीतोड़ मेहनत भी करते देखा।मगर क्या यह सब करने से बाप का दर्जा ऊँचा हो जाता है।क्या मज़बूत कँधे पर बैठकर बारिश का मज़ा दिलाने से बाप का वजूद बड़ा हो जाता है।नही,बिल्कुल भी नही।
यह वह बाते हैं जिसपर रीझा तो जा सकता है मगर फ़ख्र नही किया जा सकता।बाप वह होता है जो रास्तों की सख़्त तपिश का एहसास करवा दे।जो तुम्हे कल के आने वाले थपेड़ों से आज दो चार करवा दे।जो नदी में तुम्हे फेक दे की हाथ पैर मारकर बाहर तो निकल ही आओगे वरना वह तो है ही बचाने के लिए।बाप वह है जो तुम्हारे सख़्त अंदाज़ से रो दे।जब तुम्हारी ज़बान उसके किरदार को छलनी कर रही हो तो दे एक रपट के और तुम्हारे होश ठिकाने आ जाए।मुझे बाप में कभी सिर्फ पहाड़ सी सख़्ती नही पसन्द,पानी सा बहाव भी हो,हवा सी नरमी भी हो और आग भी तो हो।वह किसी आर्चीज टाइप का वेल पैक गिफ्ट न हो।वह ठोकर खाता प्याला हो,जिसमे बहत्तर गड्ढे हों फिर भी पानी भरा जा सके।
आज फादर्स डे है, मैं बहुत संवेदनाओं में नही घुसता मुझे रूसो के बाप भी नज़र आते हैं जो अपने बेटे से अश्लील साहित्य पढ़वाता था।मुझे साहिर के बाप भी नज़र आते हैं जिनके हाथ में हन्टर है।मुझे जावेद अख्तर के बाप भी नज़र आते हैं जो मुँह फेरे खड़े रहे।यही नही मुझे बेबस दशरथ भी नज़र आते हैं।वासुदेव की बेटे को बचाने की लगन भी नज़र आती है।शिव के जैसे बाप बनकर गुस्से में बेटे के सर कलम करने को भी देखते हैं फिर बेटे के वजूद को पूरा करने की तड़प भी दिखती है।मूसा के उस वालिद को भी देखता हूँ जो उसे सब नवाजता है और एक ही झटके में खाल भी उतार लेने के लिए आमादा हो जाता है।हज़रत मोहम्मद जैसे बाप को भी देखते हैं जो बेटी के आने पर तख़्त से खड़े हो जाते तो हातिम ताई को भी देखता हूँ जो खुद बेटियों के सामने सर झुकाकर बात करते।
बीमार हुमायूँ को अकबर की ज़िन्दगी के लिए ज़िन्दगी को छोड़ते देखता हूँ तो बुद्ध को दुनिया को सुधारने के लिए बेटे से मुँह फेरते देखता हूँ।मैं वह बुद्ध को कैसे भूलूँ जो महल से जाते वक़्त अपने बेटे के मुँह चूमते हैं, यह चुम्बन सभी दर्शन पर भारी है।
इन सबके बीच एक रिक्शे वाले,मज़दूर,किसान को बच्चों के लिए फीलियों को फटते देखता हूँ।तो पड़ोस में बाप के हाथ बेतहाशा पिटते बचपन को भी देखता हूँ।अजब है न यह बाप।।।वाक़ई बाप होना अपने आप में सम्पूर्ण भारत होना है।विभिन्नता में एकता का नाम बाप है।।।फादर्स डे है, अच्छे अच्छे क्रांतिकारी यह हैप्पी फादर्स डे कहने का जज़्बा नही जुटा पाते और मामूली से मामूली बच्चा अपने बाप के गले टँग कर हैप्पी फादर्स डे कहकर मुस्कुरा देता है।।।यही तो बाप हैं, ज़मीन के हर हिस्से में एक सी पाई जाने वाली प्रजाति।।मुबारका पिता जी।।।
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