ठीक है चलो चले जाएँगे।छोड़ देंगे तुम्हारे सिर्फ तुम्हारे दर ओ दीवार मगर साथ लेते जाएँगे यह माटी की महक।बसाएँगे एक हिंदुस्तान।वह हिंदुस्तान जो मोहब्बत की मिसाल होगा।तब तुम सम्भालना अपना जम्बू दीप।अब जब जाएँगे तो यह याद रखना साथ वह सब ले जाएँगे जो हमारा था।वह गाने,वह ग़ज़लें, वह कहानियाँ, वह पीर दरवेश,वह जानवर,वह कपड़े,वह खुशबू सब साथ ले जाएँगे।
तुम्हे पता है इस बार दिल टूटा है।भरोसा टूटा है।तुम्हारी ज़बान में वह बदबू है जिसका इलाज पतंजलि या धन्वन्तरि के पास भी नही हैं।तुम्हे इस क़दर नफरत है मुसलमानो से,इस क़द्र नफ़रत की उसमे तुम्हे अब अपना भविष्य भी दिखना बन्द हो गया।मुझसे नफ़रत करते करते तुम काँटों को चुन लोगे,यह नही मालूम था।तुम्हे क्या लगता है की जो तुम्हारा है,उसने हम राल टपकाएँगे, नही,वह सब एक झटके में छोड़कर चले जाएँगे।
अपना ज़ायका भी साथ ले जाएँगे।तुम जिस्मों से मुक्ति चाहती हो,मैं रूह से मुक्त हो जाऊँगा।महमूद अपने दोस्त मुकेश से मायूसी की हालत में यह कह रहा था।तभी मुकेश ने उसका हाथ पकड़ा और कहा की क्या क्या ले जाओगे।मेरी सब्ज़ी,दाल,मसाले, रँग,फ़सल, किताबें,लेखक,कवि।तुम क्या क्या ले जाओगे महमूद।तुममे जो मैं हूँ उसे ले जाओगे या अधूरे ही जाओगे।
कोई साध्वी,कोई महंत,कोई मौलाना कुछ भी बक्के तुम मुझमे हो महमूद।मैं तुममें हूँ।हम दोनों में हम दोनों हैं।बकने दो चलो आम खाए।यह भी तुम्हे कहीं नही मिलेगा,तुम्हारी कमज़ोरी हम जानते हैं।।।।आम का ज़िक्र छिड़ते ही दोनों छलकती आँखों से ठहाका मारकर हँसते हैं और बचपन से हर हुड़ दंग को याद करते हुए दूसरी दुनिया में गुम हो जाते है, दूर कहीं छुपकर खड़ी नफ़रत उन्हें देख झल्लाहट से पाँव पटकती हुई मायूसी से लौट जाती है।
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