जब आपका जिस्म कपड़े में बंधा मेरे कँधे पर था,तब ज़रा भी नही सोचा था की हिंदी साहित्य की एक आखरी लड़ने,जूझने वाली शाखा को कँधे पर ले जा रहा हूँ।सच कहूँ मेरी ज़िन्दगी के सबसे नज़दीक़ आप रहे,आपके आखरी सफ़र तक मैं साथ रहा,मुझे विद्युत् शवदाह गृह से उठती गर्मी और आपके जिस्म से निकलती ठंडक के बीच तबसे आज तक फसा हुआ हूँ।ताउम्र एक खुटका सा रहेगा की जिसने मेरे कलम में रोशनाई की एक बून्द डाली उसके साथ एक तस्वीर भी नही है।बातों,किस्सों का अम्बार है मगर तस्वीर नही।
मुद्राराक्षस आज ही के दिन हमे छोड़कर गए थे।विद्रोही लेखन तो सब लिखते हैं मगर जीता कौन है।मुद्रा जीवन में कभी किसी लालच या तमगे से नही डिगे।सादा मिजाज़ महान लेखक हमारे बीच से चुपचाप गुज़र गया।सुभाष चन्द्र गुप्त मुद्रा का वास्तविक नाम था,अच्छा हुआ उनके जीवन में जाति ढूंढकर पोरस्मार्टम करने वाली जाती तब सिर्फ रेंगना सीख रही थी।वरना उनका पहाड़ जैसा दलित चिंतन भी कठघरे में खड़ा कर दिया जाता।मुद्राराक्षस आप एक कठिन ज़िन्दगी गुज़ार कर बेहद बुरे वक़्त से पहले चले गए।ख़ुशी इस बात की है की जाते जाते अपने विचारों की एक ऐसी चादर दे गए जो बुरे वक़्त की तपिश से कुछ देर तो बचा ही लेगी,हमेशा हमारे दिल में रहेंगे मुद्राराक्षस।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, June 12, 2017
मुद्राराक्षस पुण्यतिथि
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hafeezkidwai
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