Thursday, June 29, 2017

अज़ीज़ मिया की बेगम

यह दूध वाली सिंवई मुझसे बर्दाश्त नही होती।तुम यही क्यों खिलाने पर अड़ी हो।मालूम है को तुमने बनाया है मगर क्या करें,मुझे दूध देख कर ही नाक बन्द करनी पड़ती है।अब गुस्से में प्याले तो न पटको,चीनी के हैं टूट गए,तो तुम्हारे अब्बा इसके भी पैसे ले लेंगे जैसे गाड़ी की खरोच के लिए थे,खासीस बाप।

अब घूरो नही,किमामी सिंवई ला पाओ तो खा लें वरना यह दही बरे ही काफी हैं।तुम कितनी ढीठ हो,कुर्सी से उठ जाओ न,अंदर तुम्हारी ही अम्मी प्याले धो रहीं हैं, एक आध धुलवा लोगी तो मर नही जाओगी।जब उनपर रहम नही आ रहा तो मुझे क्या ख़ाक किमामी सिंवई मिलेगी।

अब यह क्या,सौंफ का डब्बा बढ़ा रही हो।अभी खाया भी क्या की सौफ देदी।न खाए।भाड़ में जाओ।कुछ नही खाएँगे।ले जाओ अपना खर पतवार।अपनी अम्मी को भी ले जाओ।और जाते जाते यह मनहूस चूड़ियों भी उतारती जाना,इनकी खनक मेरे दिमाग का दही बना रही हैं।यह जो लाल लाल लिपस्टिक लगाई है, हो सके तो मय होंट के काट के हटा देना,बिल्कुल जँगली लगती हो।अज़ीज़ मिया चीखें जा रहे थे।

उधर ख़ाली कुर्सी,ख़ाली कोठी,उनकी इन रोज़ की शिकायतों की आदी हो गई थी।ईद में बिखरे सन्नाटे पन में उनकी दीवारें इन शिकवों से ही ईद की ख़ुशी महसूस करती हैं।अज़ीज़ मिया के बाप ने तो अपनी ज़िन्दगी में किसी को चौखट लाँघने न दी और खुद अज़ीज़ ने कभी नाक पर मक्खी बैठने न दी।सारी उम्र अकेले इन्ही दीवारों में कट गई।अब हर तीज त्यौहार ख़ाली बर्तनों से लड़ते हैं।चीखते हैं।उन्हें तोड़ते हैं।सामने बैठी उनकी सोच के मुताबिक बेगम ठिठक जाती हैं।

शादी क्या,घर में उनकी माँ के बाद कोई भी औरत के पाँव नही पड़े।हमे तो लगता है छिपकली मकड़ी काकरोच भी मेल ही आते होंगे।यहाँ तक पपीते और नीबू में भी फल नही आते।गुलाब के पेड़ झाड़ी में बदल चुके हैं, फूल ही नही आते।इन सबके बीच अज़ीज़ मियाँ रोज़ सुबह नाश्ते के लिए,खाने के लिए,कपड़ों के लिए,भीगी तौलिया के लिए,उलटी चप्पल के लिए अपनी बेगम से लड़ते रहते हैं।कभी उनके सोफ़े पर पड़े दुपट्टे पर चीखते तो कभी उनके परफ्यूम की खुशबू पर एतराज़ करते हुए नाक पर रुमाल धर लेते।वही बेगम जो कभी कोठी में तो आई नहीं मगर अज़ीज़ मिया के दिमाग में ज़रूर उतर गई।जिन्हें अज़ीज़ मियाँ के सिवा किसी ने न देखा,यहाँ तक खुद बेगम ने खुद को न देखा।ख्याल भी कभी जिस्म धरता है भला।आपको क्या लगता है सिर्फ लखनऊ की नूर मंज़िल में ही पागल रहते हैं।बहुत से घरों में भी नूर मंज़िल है और उन नूर मंज़िल के नवाब हैं अज़ीज़ मियाँ।

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