Thursday, June 15, 2017

कल हम सब मिटेंगे

पहले वह एक धर्म विशेष के लिए आए, मैं चुप रहा क्योंकि मैं उस धर्म विशेष का नही था।दोबारा वह लौटकर एक जाति विशेष के लिए आए, मैं चुप रहा क्योंकि मैं उस जाति विशेष का नही था।फिर वह विद्यार्थियो के लिए आए, मैं चुप रहा क्योंकि मैं विद्यार्थी नही था।फिर आदिवासियों के लिए आए, मैं चुप रहा क्योंकि मैं आदिवासी नही था।

फिर वह किसान के लिए आए, मैं तब भी चुप रहा क्योंकि मैं किसान नही था।फिर वह छोटे व्यापारियों के लिए आए, मैं तब भी चुप रहा क्योंकि मैं व्यापारी नही था।अब वह मेरे लिए आए हैं।उनकी कसम मैं आज चुप नही रहूँगा,जब तक ज़बान जिस्म के साथ ठण्डी न हो जाए,मैं उनकी तारीफ़ की नज़्म बिखेरता जाऊँगा।मैं जाऊँगा,हँसी ख़ुशी जाऊँगा।

ढोल ताशे के साथ जाऊँगा।उनके स्तुतिगान को वीर रस में गाता हुआ जाऊँगा।अपने से पहले जाने वालों को गालियाँ देता जाऊँगा,भला गुलाम भी इनकार की ताक़त रखते हैं।सबको चोर कहता हुआ मैं उनकी मधुर बाँसुरी के पीछे गहरे कुँए तक जाऊँगा।हम सब जाएँगे।वह सब,हम सब को,आज नही तो कल ले जाएँगे।कितना खूबसूरत वह गहरा अँधेरा होगा।हम आपस में टूटते फिर मिटते रहेंगे।यही तो उनकी नीति है और मिटना हमारी नियति ।।।

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