सच बताएँ हम डर जाते हैं।यह डर बेहद दिल तक गहराता जाता है।दिल से ख़ून में उतर जाता है और ख़ून से जिस्म में,फिर जिस्म सफेद पड़ जाता है।सच बताएँ यह डर है तुम्हारे जाने का,तुम्हारे दूर हो जाने का डर।तुम्हारे मुँह फेरने का डर।
मैं कभी नही चाहूँगा की कुछ लीडर,कोई विचारधारा,कोई पार्टी की वजह से तुमसे दूर हो जाऊँ।सच में मेरे लिए रिश्ते अहम् हैं।मेरे लिए तुम्हारा एहसास अहम् है।यक़ीन जानो तुम्हारे लिए बहुत सी चीज़ें छूटी तो यह क्या है।
अगर किसी का विरोध तुम्हे दूर करेगा तो मैं चुप हूँ।अगर किसी का समर्थन तुम्हे दुखी करेगा।तो मैं चुप हूँ।अगर मेरे रास्ते तुम्हारे रास्ते को काटें तो मैं रास्ता छोड़ता हूँ।अगर मेरी आज़ादी तुम्हे चुभे,तो ख़ुशी ख़ुशी गुलाम कर लो।
मैं किसी भी कीमत पर अपने दोस्तों,अपने करीब के लोगो को तकलीफ़ देकर मुस्कुराना नही चाहता।मेरे लिए मेरे साथ के लोगो की मुस्कान अहम् हैं।उनके एहसास अहम् हैं।मेरे बगल में बैठा मेरा अपना अगर कुर्सी दूर कर ले तो यह शर्म की बात है।मेरे लिखे से अगर मेरा अपना चार फ़र्लांग दूर चला जाए,तो उस लिखे पर लानत है।मुझे पता है मुकम्मल मुस्कुराहट के लिए दांत और होंट का साथ आना ज़रूरी है।इन दोनों का एका ही तो ठहाका है, खुशियाँ हैं।
हमारा चरित्र सिर्फ जोड़ने वाला होना चाहिए।अगर यह तोड़ने लगेगा तो सब खत्म हो जाएगा।अपने इर्द गिर्द के लोगो को अपनी बहसों,झगड़ों,विचारों से दूर मत कीजिये।सारा वक़्त निकल जाएगा।लीडर निकल जाएँगे।मगर दिलों में पड़ी गिरह खत्म होने की जगह पकेगी ही।बाद में इस गिरह में पस पड़ेगा फिर नासूर।इसलिए ख़ामोशी से नासूर के बीज को खत्म कीजिये।
हर अपने को अपना बनाए रखने की मुकम्मल,मज़बूत कोशिश कीजिये।वोह हैं, तो हम हैं।हम हैं तो सब हैं।सब हैं तो भारत है।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, November 17, 2016
तुम हो तो हम हैं
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hafeezkidwai
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