अहा कितनी खुशबू आ रही है।ज़ाफ़रान से रँगी शीरमाल और कबाब।बिरयानी और शोरवा।शोरवे में डूबी खुशबूदार बोटियाँ।दस्तरखान अपने उरूज पर महक रहा है।रोस्टेड चिकन अपनी टाँग उठाए रखा है।उसकी दरारों में मुगलई मसालों ने परत जमा रखी है।फ्राई फिश बोनचाइना की खूबसूरत प्लेट में करतब कर रही है।शाही टुकड़े के क्या ही कहने।चाँदी के वर्क़ और ज़रद रँग पर उमड़ी सफ़ेद परत में उमराव जान नज़र आ रहे हैं।वोह हरी पत्ती चावल का ज़र्दा भी तो तड़प कर बता रहा है की मियाँ हम भी बाक़ी हैं।सब कुछ हज़म कर लेने वाले पेट में थोड़ी जगह रखना।हर एक चीज़ लज़्ज़त के साथ तड़प रही है।
लानत हो।लानत हो।लानत हो।
ऐसे दस्तरखान और उसकी खुशबू में मदहोश ज़बान को क्या कहें।यह उन रसूल के उम्मत का शाही दस्तरखान है।जिन्होंने चीख़ चीख़ कर।मिन्नते करके।समझा समझाकर भेजा था की अपनी भूख से कम खाना।खाना गर्म मत खाना की कहीं तुम ज़ायके के चक्कर में भूख से ज़्यादा न खा जाओ।वोह रसूल खुद एक वक़्त खाना खाते।एक ही चीज़ खाते।अगर गोश्त को ज़बान लगाते तो रोटी और चावल की तरफ न देखते।दाल रोटी होती तो दूसरी तरफ न देखते।उन्होंने ताउम्र भुना गोश्त ज़बान पर नही रखा।हमेशा कहा की सबकी फ़िक्र करो।पड़ोस का दस्तरखान अगर सूना है और तुम्हारे दस्तरखान पर बहार आई है, तो इस बहार को लानत है।वोह रसूल जो पेट में पत्थर बाँधकर तरक्की के रास्ते बनाते चले गए।वोह मोहम्मद जिन्होंने मामूली सी मामूली चीज़ पर छांप छोड़ी।जिन्होंने यहाँ तक कहा की अँधेरे में पानी मत पीना।इतनी नीचे से ऊपर तक किसने उनसे पहले सोचा और समझाया था।
मैं अभी कह रहा हूँ जितनी जल्दी हो सके अपने आप पर मेहनत करो।अपने किरदार को तराशो।मोहम्मद के जैसी मोहब्बत दिलों में लाओ।हर बुरे,बद एखलाक,दुश्मन को मोहब्बत से जीतो।दिल बड़ा करो।ज़िन्दगी में किसी से बेहतर सीखने के लिए पीछे मत हटना।राम,कृष्ण,बुद्ध,नानक,ईसा या जिससे भी कुछ पा सको जो ज़मीन को महकाए,उसे बिना फ़र्क़ अपना लो।इतना जान लो इस ज़मीन पर मोहब्बत के सिवा सब खत्म होगा।मोहब्बत इसलिए रहेगी ताकि आने वाली नस्लें में उर्वरा बनी रहे।जिन्होंने मोहम्मद को नही पढ़ा,समझा है।वोह ज़हमत करें और ज़िन्दगी को जीने का सलीक़ा सीखें।ऊपर सजे दस्तरखान से मुँह फेर कर रसूल की ज़िन्दगी के फ़लसफ़े को अपनाओ।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, November 24, 2016
लज़्ज़त वर्सेज़ ज़िल्लत
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hafeezkidwai
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