तुमको लगता है हर तरफ सिर्फ मुसलमान मारे जा रहे हैं।इतना समझ लो या तो तुम गलतफहमी में हो या तो तुम भी नफ़रत की आग में कोयले झोक रहे हो।ज़रा गौर से देखो तो तुम्हे तुम्हारी चौखट से दूसरे के चबूतरे तक जो भी सताया जा रहा वोह सिर्फ मुसलमान नही है।जो किसान मर रहे हैं वोह सिर्फ मुसलमान नही हैं।जो आदिवासी मारे जा रहे हैं वोह सिर्फ मुसलमान नही हैं।जो दाभोलकर,पनसरे जैसे लेखक मारे जा रहे,वोह मुसलमान नही हैं।जो पत्रकार गाली खा रहे हैं वोह भी मुसलमान नही हैं।
सच बताएँ हर वोह मारा जा रहा है जो ज़ुल्म के खिलाफ है।सच के साथ खड़ा,कमज़ोर मज़लूम का सहारा तोड़ा जा रहा है।हर वोह गाली खा रहा जो नफ़रत के खिलाफ है।हर उसे कोसा जा रहा है जो इंसानियत के साथ है।यह मान लो अगर सिर्फ मुसलमान को बेचारा समझोगे तो तुम भी दूसरी तरह की सांप्रदयिकता की गोद में बैठे मिलोगे।लड़ना है तो बेचारापन हटा दो।वाक़ई जूझना है तो धर्म की चादर से बाहर निकल आओ।
लड़ो तो हर उसके लिए जो ज़ुल्म में टूट रहा है।हिम्मत उसे दो जो तुम्हे रीढ़ दे रहा है।खड़े उसके साथ हो जो नफ़रत को हरा रहा हो।साथ उसका दो जो मोहब्बत के झण्डे को थामे है।लड़ाई को सिर्फ मुसलमान के दायरे में लेकर कमज़ोर मत करो।आज लड़ना है तो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आओ।अपने को मुट्ठी भर झंडो में मत क़ैद करो,वरना लड़ नही पाओगे।
जब जब झण्डा इंसानियत का बुलन्द करोगे,यह देश तुम्हारे साथ होगा।गलती से भी इसे धर्म के झण्डे के नीचे लाओगे तो अकेले खड़े मिलोगे।मेरी बातें तक़लीफ़ देंगी मगर एक बार ठहर कर सोचो की क्या वाक़ई सच्चे,इंसाफपसन्द,मोहब्बत करने वालो की जिंदगियां जहन्नम नही बनाई जा रही।वोह मुसलमान नही हैं।वोह ज़िंदा लोग हैं।लड़ाई का दायरा बड़ा करो।हम अभी कह रहे हैं हर मोहब्बत वाले के साथ आओ।हर कमज़ोर की आवाज़ बनो।हर ज़ुल्म के खिलाफ एक हो।यह वक़्त बुरा है मगर मेरा यक़ीन करो,इस बुरे वक़्त में भी बहुत ज़्यादा अच्छे लोग जूझ रहे हैं।वाक़ई वोह दिलों से परेशान हैं।उनके माथो पर मैंने शिकन देखि हैं।उनके दिल की मायूसी को महसूस किया है।दोस्त वोह चादर से बाहर आ जाओ,जो इन फिक्रमन्द लोगो के पैर की ज़ंज़ीर बनी है।इंसानियत का झण्डा आगे करो।यह सब पूरी शिद्दत से तुम्हारे साथ होंगे।
यह देश हमेशा से मोहब्बत के साथ रहा है।इसका ख़मीर अभी खराब नही हुआ है।इसका इम्तेहान मत लो।बस बिना शक,शिकवे के इनको साथ लो और बढ़ चलो।देश यक़ीनन मुस्कुराते हुए बढ़ चलेगा।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Wednesday, November 2, 2016
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hafeezkidwai
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