Tuesday, November 1, 2016

हौसलो का खण्डहर

उसके हाथ में ताज़ा ताज़ा प्लॉट आया था।ज़मीन का सबसे शानदार टुकड़ा।उसने उसमे शानदार घर बनाने का ख्वाब देखा।झट से शहर के सबसे क़ाबिल आर्किटेक्ट से नक्शा बनवाया।वोह चाहता था,उसका घर शहर का सबसे नायाब घर हो।उसके घर में सारी सुविधाएँ हों।वोह सोचता था की उसके घर में उसके रहने वाले अपने बेहद खूबसूरती से रहें।
घर में खूबसूरत टायल्स लगाए गए।छतों को पीयूपी से सजाया गया।नल की टोटियाँ भी हज़ारों की थीं।घर की खिड़कियाँ ऐसे खुलती थीं की सबको हवा मिले,किसी का कहीं भी दम न घुटे।सबके हिस्से में सूरज की रौशनी आए।सबके जिस्म को कुदरत की ठण्डी ठण्डी हवा लगे।
घर बनकर तैयार हो गया।शुरू शुरू में बनाने का हौंसला कुछ दिन चला।फिर जैसे जैसे लोग मरते रहे,वक़्त गुज़रता रहा।घर को संवारने का हौसला जाता रहा।कल तक एक एक नोक पलक रखने वाला अब बहती टोटियाँ पर भी ध्यान नही देता।झड़ती पीयूपी पर भी उसकी नज़रें नही ठहरती।दीवारों पर जमती काली काई भी अब उसके हौसले को नही जगाती।अब उसका दिल भर चुका है।
ठीक ऐसा ही होता है एक देश।उसके बनते वक़्त बड़े हौंसले होते हैं, फ़िक्रें होती हैं, एक संविधान बनता है।जो सबको खुली साँस देता है।धीरे धीरे वोह बनाने वाले लोग मारते जाते हैं और देश घर की तरह पुराना होता जाता है।सारे हौंसले मर चुकते हैं अब सिर्फ फिक्रमन्द लोग लेटे लेटे उसे बूढ़ा होने देते हैं।नए लोग,जिन्हें निर्माण का न भी नही पता।वोह घर की मोटी मोटी दीवारों पर कव्वे के गू से उगे पकड़िया का पेड़ की तरह होते हैं।जो धीरे धीरे मज़बूत महलों की दीवार को भी ढहा देते हैं।इस तरह एक खूबसूरत घर खँडहर बनता है।हाँ खण्डहर।हमारे पुरखों का खण्डहर।उनके ख्वाबो का खण्डहर।उनकी उम्मीदों का खण्डहर।अब बस देखना यह है की यह शानदार घर,खण्डहर हमारे सामने होता है या हमारे बच्चों के।हमारी दीवार पर पकड़िया का पेड़ बड़ा हो चुका है।अब उसकी शाखाएं ज़मीन में लगने लगी है।

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