आओ तुम्हे पुराने खड़ंजे पर ले चले।उस खड़ंजे से सटी कच्ची गली में ले चले।कच्ची गली के तीसरे घर में ले चले।तीसरे घर के छप्पर में पड़े पलँग पर बैठाएं।तब कोई तुम्हे मट्ठे का गिलास भर कर दे।हल्की सी शकर डालकर।तुम पियो तो,मट्ठे की खटास मिठास के साथ जब मुँह में घी की हल्की सी फुटकी फूटेगी और उसके दानेदार बिखराव से ज़बान एक अलग एहसास को महसूस करेगी।इसका ज़ायका कहीं और नही मिलेगा दोस्त।
अच्छा चलो तुम्हे चमकते हुए इंटरलॉकिंग टाइल्स पर ले चले।रास्ते में लगे झुरमुट फूल वाले पेड़ो से सर को बचाना।विक्टोरियन लैम्प की खूबसूरती में रुक मत जाना।तुम्हे चलो हॉउस नम्बर 12/345 में ले चलें।गेट से घुसते ही खूबसूरत घर में दमकते मार्बल में ले चले।ज़बरदस्त खूबसूरती बिखेरती पीयूपी और दूधिया रौशनी उड़ेलती एलईडी में ले चलें।इटैलियन डायनिंग टेबल पर बोन चाइना की नाज़ुक प्लेट में कोई नेपकिन लगाकर तुम्हे अगर अपने हाथ की बनाई ओनियन पकौड़ी दे तो इसका भी मज़ा कहीं और नही मिल सकता मेरे दोस्त।
देखो दोनों तरह के ज़ायके और माहौल का मज़ा लेना हो तो बिंदास,बेलौस लोगों के दिलों में उतरो।उनकी धड़कन को महसूस करो।उनके जज़्बात की क़दर करो।उनकी साँसों की पाकीज़गी पर सर झुकाओ।यक़ीनन तुम्हे सब ज़ायके अपनी खलिस खास खुशबु के साथ तुम्हे वजूद को महका देगी।मगर,हाँ मगर जैसे ही तुम इसमें मज़हब देखोगे,इसमें अपने विचारों की शक्ल देखोगे,इसमें पार्टी देखोगे,इसमें ज़ात या भोगौलिक सीमाएँ देखोगे,एक झटके में तुम किसी घूरे की तरह इनसे कहीं दूर खुद को पाओगे।मट्ठा और पकौड़ी तो लोग तुम पर फेक जाएँगे मगर कभी भी तुम्हे वोह आलीशान कोठी स्वीकारेगी और न वोह सौंधा छप्पर।तुम अकेले अपनी गन्दगी के साथ खुले आसमान के नीचे पड़े रहना।
मैं अभी कह रहा हूँ अगर इस ज़मीन की खुशबू महसूस करनी है तो अपनी हदें तोड़ दो।इस माटी को ज़िन्दगी में महसूस करना है तो नफ़रत के नुकीले तारो को काट दो।इस मिटटी के सच्चे आशिक बनना है तो दूसरों से नफ़रत करना छोड़ दो।इस माटी का सच्चा वारिस वही है जो इस माटी पर बसने वाले हर एक से मोहब्बत करे।उसके दर्द को समझे।उसकी खुशिओं में शामिल हो।आओ चलो तुम्हे मोहब्बत के दरिया में ले चलें जहाँ बुधई की दुल्हन मट्ठा लिए बैठी है और करन की ममा ओनियन पकौड़ी।आओ तुमहे दोनों की ऊँगली का ज़ायका दिलवाऊँ, बसतुम नफ़रत को बहुत दूर जाकर थूक दो मेरे दोस्त।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Tuesday, November 22, 2016
मोहब्बत का ज़ायका
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hafeezkidwai
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