एक अवाम थी जिसने हिटलर को देखा था।एक थी जिसने मुसोलिनी को देखा था।एक थी जिसने स्टालिन को देखा था।उनमे से बहुत से लोग इनसे खुश थे।उनके ख़ून से रँगे हाथ उस अवाम को मेहँदी लगे हुए हाथ लगते थे।उनके दाँतों में लगा ख़ून उन्हें पान के बाद का सुर्ख़ रँग लगता था।इनकी आँखों में शैतानियत की चमक उन्हें तेज लगता था।इनके माथों पर उतरी नफ़रत की रेखाओं में उन्हें अपना सुंदर भविष्य दिखता था।
हुआ क्या।कुछ भी नही।एक एक करके यह भी रुखसत हो गए।वोह भेड़ जैसी अवाम भी आकर चली गई।जमींन के उन टुकड़ों,जिन्हें यह देश कह कह कर चीखते थे,उसने सिर्फ हाँ उसने अपनी उर्वरा शक्ति को ज़िंदा रखा।उसने अपनी माटी में दबे ज़ुल्म के खिलाफ और इंसानियत का परचम लिए लोगो को बीज के मानिंद अपने में दबाए रखा।उनमे कोपल फूटे।आज वोह फिर दरख्त बन गए।यह मान लो,चाहे जितना तांडव कर लो,चाहे जितनी नफ़रत की आग को हवा दे लो।आखरी में शांति के ही पथ पर चलना होगा।
अब आओ, अपनी दहलीज़ पर।ऊपर जिनके नाम लिखें हैं।उनके जैसा यहाँ कोई है भी नही।उनके जैसी अवाम भी इस चौखट पर नही है।हो सकता है वक़्ती बहकावा हो मगर इतना यक़ीन करना इस देश की अवाम भेड़ नही है।उनके दिलों में मोहब्बत की गरमी ही है।बस जो सच के साथ हैं, जो ज़ुल्म के खिलाफ हैं, जो नफ़रत को हराना चाह रहे हैं, जो दिल से भारतीय हैं वो मायूस मत हों।वोह बीज की तरह रहें।यह माटी उनमे भी कोपल फोड़ेगी।
आखरी तक मत कहना की यह देश उनका है।यह देश हमारा है।हमारे जैसों का है।इस देश की आत्मा हम हैं।इस देश में गंगा जमुनी पानी ही चलेगा,किसी के दिमाग की सडांध से निकला पानी नही चलेगा।हिम्मत से आगे आओ।लोग तुम्हे उम्मीदों से देख रहे हैं।तुम्हारे बोल उनकी उम्मीदों के पंख हैं।दोस्त हिम्मत मत हारना।तुम ही भारत हो।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, November 3, 2016
हम बीज हैं
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hafeezkidwai
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