"हम हैं,की हम नहीं"।।।हैदर फ़िल्म का यह गाना याद है।कश्मीर में नौजवान गायब हो रहे थे।न उनके गायब होने की फ़िक्र थी,न दर्द।न ही एहसास हमारे करियर की धुन में आड़े आ रहे थे।हमे लगा यह मामला कश्मीर घाटी तक ही है।नक्सल इलाकों में नौजवान गायब हो रहे थे।हमे तो उनकी गिनती भी नही याद।उनका ज़िक्र भी नही आया जबान पर।हमे लग रहा था,यह नासूर सिर्फ कश्मीर या आदिवासियों तक ही रहेगा मगर हम गलत थे।
जब हमारे सामने,हमारी चौखट से,हमारे नज़रों के बीच से एक लड़का गायब हो गया।नजीब।एक दिन,दो दिन,कई हफ़्तों के बाद भी नही पता चला की वोह कहाँ है।तब भरम टूटा की नासूर हमारे जिस्म में लग चुका है।यह नासूर ऐसा है की रोने भी नही देगा।सिसकने भी नही देगा।लेटने भी नही देगा।
जब तुम पूछोगे की नजीब कहाँ है।तो कश्मीर और आदिवासियों से सीख चुकी पुलिस तुम्हे बताएगी कहाँ है।जब तुम कहोगे सरकार नजीब कहाँ है।तो लठैत तुम्हारें नामों में झलकता धर्म देख तुम्हारी जगह बताएँगे।जब तुम चीख़ कर कहोगे नजीब कहाँ है।तब पुलिस तुम्हारे मुँह की यह गुस्ताखी कैसे रोकनी है, वह जानती है।कुल मिलाकर बताएँ,जब तुम झुँझलाकर पत्थरउठाओगे।तो तुम्हारे चेहरों पर सितारे बनाने का इंतज़ाम उन्होंने कश्मीर से सीख लिया है।
यह सब होगा अगर तुम बोलोगे मगर यह भी मान लो यह सब तब भी होगा जब नही भी बोलोगे।एक दिन नम्बर आएगा।इसलिए निकलो।देखो वोह जो 24 दिन से नजीब के लिए जूझ रहे हैं।यह वोह हैं जो मज़हब,दल,सोच से बिल्कुल जुदा हैं नजीब से,फिर भी लड़ रहे हैं।यह मामला सिर्फ नजीब का नही है।यह दस्तक है घाटियों की।यह दस्तक है जंगलो की।वोह माँ देख लें,जिनके बच्चे दूसरी माँ की गोद को सूना कर रहे हैं।वोह बहने देख लें, जो किसी दूसरी बहन को रक्षबन्धन में आँसू दे रहे हैं।वोह भाई देख लें, जो किसी दूसरे का भाई छीन रहे हैं।हर ज़ुल्म पलट कर तुम्हारे सामने खड़ा होगा।तब तुम्हारी आँखों के आँसू बेमानी होंगे।
हाँ ज़रा अपराध को गहरी नज़रों से देखने की आदत डालो।देखो यह अपराध पहले कहाँ कहाँ इस ही तरीके से हुआ है।कहीं यह अपराध किसी धारावाहिक अपराध की नीव तो नही हैं।कहीं यह आहट किसी भूगोल के हिस्से का रँग बदलने की तो नही है।कहीं दिल्ली हाँ हमारी दिल्ली को ज़मीन की दूसरी जन्नत बनाने की साजिश तो नही है।किसी भी फैसले पर पहुँचने से पहले अपने दिमाग को खूब कुरेद लो।खुरच लो।सोच लो।तब कहो की हाँ यह गलत है।किसी भी इंसान का हमारे बीच से गायब होना गलत है।उस गलत को सही करने के लिए निकलो।अपनी बारी आने से पहले निकलो।दूसरे के जलते छप्पर की चिंगारी तुम्हारे छप्पर को भी चपेट में लेगी।तुम,मैं छोड़ हम निकलें ताकि कल कोई यह न गाता मिले.."हम हैं,की हम नहीं।"
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, November 7, 2016
हम हैं की हम नहीं
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hafeezkidwai
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