"हाँ तो कर दो न सर कलम।जब मेरा सर धड़ से जुदा होकर ज़मीन पर गिरेगा तब देखना,हाँ तब भी देखना सरमद मुस्कुरा रहा होगा।उसकी मुस्कान तुम्हारे आलमगीर के दिल में जलते गुरूर के चराग़ को बुझा देगी।"
सरमद को सर कलम करने से पहले उसका गुनाह बताया गया की सरमद के जिस्म पर एक भी कपड़ा नही रहता है।वोह नंगा घूमता है।आलमगीर के कई बार मना करने के बावजूद सरमद ने शर्मगाह पर एक बालिश्त का कपड़ा भी नही ढका।यह कुदरत के कानून के खिलाफ है जिसको ध्यान में रखकर सरमद को सज़ाए मौत दी जाती है।
सरमद मुस्कुराता हुआ कहता है कुदरत का कानून।जाओ अपने छोटे से दिल वाले बड़े आलमगीर से कहना की कुदरत का कानून सरमद ने नही तुम सबने तोड़ा है।तुम्हारे नंगे पैदा हुआ बादशाह ने अपने तन पर मखमल का टुकड़ा डाल कर कुदरत का कानून तोड़ा है।तुमने इंसानों के लिबास में फ़र्क करके कुदरत का कानून तोड़ा है।देर न करो ऐ मेंरे प्यारे जल्लाद।कहीं तुम्हारा दिल सरमद की बातों में लिपट कर सही तरफ न चला जाए।तुम्हे तुम्हारे ही आलमगीर से ज़िन्दगी छीन लेने का फरमान न मिल जाए।मेरा सर कलम कर दो।
एक झटके में मशहूर सूफ़ी सरमद का सर ज़मीन पर पहुँच गया।इस तरह आलमगीर ने अपने सबसे बड़े दुश्मन,कुदरत के कानून को दरकाने वाले,सरमद को सज़ाए मौत देकर ईश्वर की सत्ता की रक्षा की।इतिहास सरमद,आलमगीर और हमारी नज़रों में हमेशा उलझा रहेगा।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Wednesday, November 16, 2016
सरमद
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hafeezkidwai
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