Wednesday, November 9, 2016

कुछ तो खुद की करो


अपने दिमाग का खालीपन देख लीजिये।जब कोई दूसरा आपको बोलने के लिए विषय दे।लिखने की वजह दे।जब कोई दूसरा आपके मुँह में अपने चबाए हुए लफ़्ज़ दे और आप झूमकर उन अल्फाज़ो में अंताक्षरी खेलें, तो समझ लीजिये आपका दिमाग किसी पुरानी कोठी की तरह ख़ाली है।उसमे चमगादड़ो और मकड़ियों का डेरा भर है और कुछ भी नही।
वोह दूर से खड़ा एक हरकत करता है और समर्थक हुआँ हुआँ हुआँ करने लगते हैं।वोह फिर हरकत करता है तो विरोधी सुर देने लगते हैं।जब आपका विरोध और समर्थन सिर्फ एक व्यक्ति के दामन के इर्द गिर्द रहे तो बताइये आपके दिमाग को क्या कहें।क्या कहें की आप कल किसी की ख़ाली थाली देख बड़े मचल रहे थे मगर आज विरोध किसी और बात का कर रहे हैं।क्या कहें जब आपका बच्चा थक हारकर नौकरी के लिए लड़ रहा था,आप परेशान थे,मगर आज आप उसी नौकरी का इंतज़ाम न करने वाले की खुशियों के गीत गा रहे हैं।वोह भी ऊँची आवाज़ में।
बात यहाँ यह है की हमारी ज़रूरत क्या है और उसके इंतज़ाम क्या हैं।हमारी तक़लीफ़ क्या है और उसे दूर कौन करेगा।हमारी ख़ाली थाली का हिसाब कौन देगा।हमे नही पता की आप क्या बन्द करेंगे या क्या खोलेंगे।हमे नही जानना की आपके समर्थक क्या गीत गा रहे या आपके विरोधी क्यों उलटी कर रहे हैं।हमे हमारे मुद्दों पर बात चाहिए।एक्शन चाहिए।
इतना समझ लीजिये जिसका समर्थन आसान हो और विरोध मुश्किल,यक़ीनन वोह गलत रास्ता है।जिसका समर्थन मुश्किल और विरोध आसान हो तो वोह बेहतर रास्ता है।आज समर्थन में सुर ऊँचे किये जा रहे हैं विरोध मुश्किल है।विरोध निर्माण के लिए है।मगर कोई निर्माण चाहता ही कब है।कोई बेसिक ज़रूरतों की बात ही नही कर रहा।
मैं अभी कह रहा हूँ अपने दिमाग का इस्तेमाल करो।अपने मुँह से निकले वाक्यों की रचना सिर्फ तुम्हारी हो।उन वाक्यों में चुने शब्द तुम्हारे शब्दकोश के हों।उनमे गुँथा एहसास तुम्हारा हो।उसने तुम्हारे तक़लीफ़ की ओस की बूंदे हों।उनमें तुम्हारी खुशियों की महक है।दोस्त जो भी कदम उठाओ समर्थन या विरोध,उसका हर एक हिस्सा तुम्हारी उपज हो तो तुम यक़ीनन जीते जागते इंसान हो।

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