बड़े से मैदान में गेंहूँ की फसल लहलहा रही थी।यह एक फसल कई लोगों की ज़िन्दगी थी।किसान जी तोड़ मेहनत में लगा था।उसे पता था इसमें उगने वाला गेहूँ सिर्फ और सिर्फ इंसान के हिस्से का है।इस खेत की माटी में रेंगने वाले कीड़े चिड़ियों का खाना है।गेहूँ के पौधे,जब गेहूँ उगल देंगे।तब यह जानवर का खाना है।उसे पता है उसका खेत चिड़िया,जानवर,इंसान सबके हिस्से का खाना समेटे है।उसे बस इतना करना है की यह ध्यान रखे की एक को खाना देने के चक्कर में दूसरे का खाना बिगड़ न जाए।
अगर वोह जानवर को पहल करने देता है तो इंसान का गेंहूँ खत्म हो जाएगा।इसलिए वोह कई महीने जानवर से हिफाज़त करके गेंहूँ इंसान तक पहुँचाता है।बाद में गेंहूँ से अलग भूँस जानवर को देता है।उसके इस कदम से तीनो खुश हैं।
अब ज़रा लौटीये हमारी तरफ।हमारा एक एक लेख पहले इंसानों के लिए है।उसके बाद जानवरो के लिए है।हम अपनी फसल को पहले जानवर को नही देंगे।उनकी फ़िक्र है हमे।उनके पढ़ने के लिए दूसरी चीज़ें वक़्त वक़्त पर मिलती रहेंगी।मगर फसल की सर्वोत्तम चीज़ें इंसान के लिए ही हैं।यहाँ हम जानवरो को गोबर नही करने देंगे।
जो लोग अच्छे भले लिखे में गालियाँ लिखते हैं।जिनका मानसिक विकास पहली ही सीढ़ी पर ठहरा हुआ है।जो अपने खलीफा की गुलामी में मदमस्त उछल कूद मचाए हैं।जिनकी ज़बानें हद दर्जे गन्दी हैं और ज़हन तो दूर से ही सड़ाँध मारता है।उन्हें दूर रखना।उनसे फसल की हिफाज़त करना।हमारा कर्तव्य है।हम अपने इंसानों के लिए इन जानवरों को फसल चट नही करने देंगे।
देख लीजिये बात बड़ी साफ़ है।जिनके माँ बाप उनको तमीज़ नही सिखा सकें हैं की बात कैसे की जाती है।जो गुलामी में गुस्ताखी की सारी हदें पार कर जाते हैं।उनकी आवाज़ मेरे दिल तक नही पहुँचती।मैं मानता हूँ की वह बीमार हैं मगर हर बीमारी का ईलाज अभी मुमकिन नही है।इतना समझ लीजिये की अगर ज़रा भी आपमें मोहब्बत नही है तो यहाँ मत ठहरिये।अभी यहाँ गेहूँ की फसल है जिसे इंसानों तक पहुँचाना हमारा मूल कर्तव्य है।यक़ीन जानिए जैसे ही भूँसा आएगा,हम आपको आवाज़ देकर बुलाएँगे।तब तक इस फसल पर अगर मुँह मारा,तो गले में मचवा बाँधना हम किसानो को बेहतर आता है।
मोहब्बत से रहिये।इज़्ज़त दीजिये,भले आपको इसकी ज़रूरत ना हो।अपनी माँ की परवरिश पर सवाल मत उठवाईए।मेरे लिए वोह पूजनीय हैं।और हाँ यह किसी खास के लिए नही है हर उस मज़हब,ज़ात,पार्टी,सोच,संगठन के लिए है जिनकी ज़बान पर गंदगी की मोटी परत चढ़ चुकी है।जिनके दिमाग में फँफूंदी लगी हो।होश में रहिये ताकि ज़माने में मुस्कुराहट ज़िंदा रहे।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Saturday, November 5, 2016
होश में रहें
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hafeezkidwai
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