बेगम अम्मी ने चीख़ कर कहा यह स्टील का गिलास कौन ले आया दहलीज़ पर।तुम कमबख़्तो को नही पता की स्टील की झूठी और आम चमक हमारी ज़मीदारी को निगल जाएगी।जब वोह चीख़ रही थी तो किसी को नही पता था स्टील, ज़मींदारी के गुरूर को कैसे तोड़ेगा।
देखते देखते ताम्बे और पीतल के बर्तनों की जगह स्टील और एल्युमिनयम ने ले ली।कहर तो तब टूटा जब चीनी और ताम चीनी की खूबसूरत नक्काशीदार प्लेटें बाजार में पहुँच गई या कूड़े के ढेर में और उनकी जगह स्टील ने लेली।बेगम ने पूरी हुक़ूमत को ताम्बे की तरह पिटते देखा।पीतल की तरह घिसते देखा।रौब और गुरूर को बार बार चीनी के बर्तन सा टूटते देखा।
एक दिन बेगम के कान में पड़ा की चना महंगा हो गया है।इतना महंगा की उसने गेंहूँ को भी पिछाड़ दिया है।गेहूँ से महँगे चने का तसव्वुर बेगम की सल्तनत की आखरी कील थी।वोह मुरझाई हुई,पान की बची इकलौती गिलौरी मुँह में रखती हुईं बोली"आह, मोटे अनाज ने महीन अनाज को पिछाड़ दिया है।यह हमारे डूबने की आखरी निशानी हैं।" इतना कहते हुए बेगम ने वही तख्त पर लुढ़क कर दिखा दिया की वाक़ई शम्मा बुझ चुकी है।बेगम के जिस्म पर उनका खुद का बुना कामदानी का सफ़ेद दुपट्टा डाला गया।कब्रिस्तान भी उन्हें उस वक़्त मयस्सर स्टील के पलँग पर ले जाया गया।आखिर स्टील ने अपनी वफ़ादारी निभाई और ज़मीदारी का गुरूर कब्रिस्तान तक पहुँचा कर पूरी कोठी को अपना लिया।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Tuesday, November 15, 2016
स्टील
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hafeezkidwai
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