Friday, February 24, 2017

बात तो करो

मैं जब ज़ख्म पर हाथ धरता हूँ तो ज़ख्म खुद फूट पड़ते हैं।उसमे से हर तरह का दर्द बह निकलता है।उस दर्द के बहाव में चीखें आँसुओं से लथपथ बाहर आती रहती है।इन चीखों के बाद ही तो सुक़ून है।
हो सकता है आप बड़े तुर्रम खाँ न हों मगर आप सुन तो सकते ही हैं।अपने इर्द गिर्द बैठे हर उस शख्स को सुनने की कोशिश कीजिये जिसके माथे की सिलवटें आपको ठहरने को कह रही हो।उसकी आँखे आपको कुछ बताना चाह रही हों।दिल अंदर से बार बार आपको अपनी तरफ खींचने की आवाज़ कर रहा हो।
वक़्त धीरे धीरे कम होता जा रहा है फिर भी अगर किसी को सुन सको तो सुनो।उसको एक ढाँढस तो दे ही दो की कुछ हो न हो अंत तक मैं तो रहूँगा।यह इसलिए आज कह रहा हूँ क्योंकि मेरे नज़दीक़ का एक बहुत संवेदनशील साथी कुछ दिन से बुझा बुझा सा था।
मैंने तो समझकर बात कर ली और वोह एक दम से बह निकला।फूट फूट रोया और फिर कुछ हल्का होकर घर चला गया।वहाँ से थैंक्स का मैसेज किया।कल पता चला उसके घर से एक लाश निकली।दिल टूट गया।जी चाहा की उसका कॉलर पकड़ लूँ मगर क्या करता।
लाश उसकी नही उसकी बहन की थी।बहन भी कुछ डिप्रेस थी जिसे घर के किसी शख्स ने महसूस ही नही किया।यहाँ तक उस साथी ने भी नही जो खुद हफ्ता भर पहले ऐसे ही खड़ा था।
मुझसे रोते हुए उसने कहा की आपने तो इतनी दूर से मेरा दिल पढ़ लिया मगर मैं अपने पास बैठी अपनी बहन को पढ़ नही पाया।पूछ नही पाया।कुछ बता नही पाया।इसलिए कह रहा हूँ बात करो।अपने इर्द गिर्द बात करो।बिना फ़र्क बात करो ताकि ज़ख्म को फूटने का रास्ता मिले।तभी तो ज़ख्म सूखेगा और जिस्म मुस्कुराएगा।

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