Tuesday, February 7, 2017

किताबें

मैं कपड़े उतारकर जिस्म को देखता हूँ।अपने जिस्म को गौर से देखता हूँ।खाल ज़ख्मो के निशान से नक्काशीदार चादर हुई जाती है।ख़ून बून्द बून्द बहकर,ज़ख्मो की ताज़गी का एहसास करवाता है।सफ़ेद बाज़ुओं पर सुर्ख़ निशानों से उठती भाँप पूछती है की किस काँटों के जँगल से होकर गुज़रे हो।अब कौन कहे की यह ज़ख्म काहे के हैं।
कैसे कहें यह ज़ख्म किसी जँगल के नही हैं।यह निशान काँटों के नही हैं।
यह नुची हुई खाल किसी बीहड़ के रास्ता रोकने की निशानी नही है।यह तो उन रास्तों के निशान हैं जहाँ से कल मैं गुज़रा था।जहाँ से मैं गुज़रता रहा हूँ।जहाँ से हमेशा गुज़रता रहूँगा ,भले सारी खाल जिस्म से खिंच कर निकल जाए।मगर वोह रास्ते कैसे छोड़ूँ।
मुझे किताबे ज़ख्म देती हैं।लाइब्रेरी से निकलते वक़्त किताबें चीखकर झपट पड़ती हैं।धूल में लिपटी यह किताबें मेरा कॉलर पकड़कर लड़ती हैं।पीली और कमज़ोर पड़ चुकी किताबें भी तलवार सा ज़ख्म छोड़ती हैं।रैक पर लिखा तो काव्य होता है मगर मुझपर सीसा पिघलता हुआ लगता है।
जब जालों को तोड़ता हुआ मैं एक किताब पर हाथ रखता हूँ,तो बगल में रखी किताब हाथो पर गिरकर,उँगलियों को कुचलने लगती है।हर किताब होड़ करती है की मुझे उठाओ,मुझे पढ़ो,मुझे बड़ी मेहनत से लिखा गया है।मुझमे लिखने वाले ने अपनी रूह को निचोड़ दिया था।कोई किताब कह रही होती है की मुझमे अल्फ़ाज़ दर्ज करने वाले ने दसयों दिन खाना नही खाया था।मेरे आखरी पन्नों से पहले मुझे लिखने वाले के बच्चों को पहली मुस्कान नही मिल पाई थी।
पूरी की पूरी लाइब्रेरी मेरे जिस्म से भिड़ती है।हर किताब अपने हिस्से की मोहब्बत, ज़ख्म की शक्ल में देती है।शीशे के सामने खड़ा मैं इन किताबों से निकला दर्द महसूस कर सकता हूँ।सच कहूँ तो इन ज़ख़्मो से उपजी तक़लीफ़ मुझसे फिर कहती है की इन्हें थाम लो।
कुछ तो यहाँ तक चीख़ कर कहती हैं की मेरे पास से हट जाओ।मैंने बड़े बड़े तख्त बर्बाद कर दिए,तुम्हारा क्या वजूद है।किताबें रोज़ मुझसे भिड़ती हैं।मैं रोज़ किताबों में खत्म होता हूँ।

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