Thursday, February 16, 2017

यह आतँक

चलो अच्छा हुआ बहुतों को क़त्ल करके तुमने अपना मज़हब और ईमान बचा लिया।बच्चों के ख़ून से तुम्हारे चेहरे पर चमक आ गई।औरतों के बिखरे जिस्म से तुम्हे सुकून तो मिल गया।मिट्टी में मिल चुके आदमियों से अब तुम्हे कोई खतरा नही रहा।तुमने एक झटके में तुम्हारे मज़हब में आ रही चिटखन को दूर कर लिया।
मुझे कोई हैरत नही की तुमने शाहबाज़ कलन्दर की मज़ार पर सैकड़ो को एक झटके में खत्म कर दिया।वोह ज़मीन इस तरह बहते ख़ून की आदी हो चुकी है।पाकिस्तान जिसकी बुनयाद ही ख़ून है, वहाँ सुकून की तवक्को बेईमानी है।हम पागल लोग सिर्फ यही ख्वाब देखते रहे की चलो ठीक है तुम चले गए,मगर सुकून से तो रहो।नही रह सकते तुम।तुम्हे क्या कहें तुममें पनपती गन्दगी ने तो अब हमे भी पकड़ लिया है।अब हम भी बहते ख़ून पर कान नही धरते।हम भी चाहते हैं की यह ज़मीन भी तुम्हारे जैसी हो जाए।
मेरा बस चलता तो तो ख़ुदा के सामने तुम्हारे कॉलर को खींच कर कहता की देखिये,आपने इतना बड़ा धोखा दिया।ख़ुदा से पूछता की इंसान और जानवर के सिवा यह कौन सी नस्ल बना दी।जिसकी सूरत इंसान की,हरकत जानवर की और दिमाग वहशी।
मैं ख़ुदा से पूछूँगा जब हमारे जिस्म टूट कर इधर उधर बिखरते हैं, तो उन्हें कैसा लगता है।जब हमारे बच्चों के टुकड़े कभी दीवार तो कभी दरख्त पर जाकर चिपक जाते हैं तो कैसा लगता है।ख़ुदा खुद कहता है की उसमे सत्तर माओं का जज़्बा है।तो तड़प कर चीख़ क्यों नही देता।उसके आह से निकली चीख़ इन कम्बख्तों के दिमाग को नाक से बहा क्यों नही देती।
मैं रसूल से भी पूछूँगा की ताएफ के मैदान में जूतियों में उनके खुद के ख़ून से डूबे पाँव क्या इस दिन के लिए थे की उनके ही मानने वाले सबको ख़ून में डुबो दें।मुझे पता है रसूल इतना ज़िन्दगी में नही रोए होंगे जितना अब रोते होंगे।तुम मुझे किसी भी कटघरे में खड़ा करो मगर यह मानलो की अगर तुम्हारा यह मज़हब है तो मैं तुममें से नही।कल शाहबाज़ कलन्दर की मज़ार पर बिखरे जिस्म कब्र में लेते कलन्दर को और अंदर धँसा ले गए।
जिन्होंने ताउम्र मोहब्बत से लोगों को जोड़ा उनके ही चमन में तुमने इंसानियत को शर्मिंदा किया।मैं कैसे कहूँ की तुमसे नफ़रत हो रही है, नफ़रत भी तो हम नही कर सकते किसी से।मगर ख़ुदा से तो है शिकवा की अगर यूँ ख़ून के दरिया बहाने ही हैं तो क्यों नही इसे पूरा खत्म कर देते हैं।या तो सब खत्म कर दें या हमे ही खत्म कर दें।

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