"दूर के ढोल सुहावने होते हैं।"रट रट कर यह मुहावरे दिमाग में बैठाए।इनका अर्थ बचपन में इतना लगता था की अगर ढोल करीब बजने लगे तो कान फट जाएँगे,थोड़ा दूर बजे तो ढोल का मज़ा आएगा।बस यही अर्थ बचपन भर ढोया।
अब जाकर यह मुहावरा दिल ओ दिमाग में पैबस्त हुआ।जब दूर से एक नामचीन हस्ती को देखा।उनकी चमक देखी।दिल में आया काश इनसे मिल पाता।वोह मौका भी आया,हम मिले।हमारे लिए किसी ख्वाब से कम नही था उनसे मिलना।फिर नज़दीकियां बढ़ी,तब उनके दिल में सड़ रहे गोश्त से उठने वाली बदबू ने नाक को बेचैन कर दिया।इतनी गन्दी ज़हेनियत,यह हैं मेरी पसन्द।मैं दूर भागा।
यह करते करते सैकड़ों मशहूर हस्तियों के पास पहुँचा और उनके पास से होने वाले तेज़ शोर से भागता रहा।तब जाकर यह मुहावरा दिल ओ दिमाग में छाया की वाक़ई दूर के ढोल सुहावने होते हैं।इनके नज़दीक़ मत जाओ वरना ढोल से चिढ़न पैदा हो जाएगी।
कभी कभी दूसरा मुहावरा "ढोल के अंदर पोल" भी इनमे सही साबित होता है।आप उन शख्सियतों के जब करीब जाकर देखते हैं की यह तो सिर्फ मढ़ा हुआ है अंदर से ख़ाली है तब भी अफसोस होता है।हम बहुत बार सदियों पहले गढ़े मुहावरे हमेशा ज़िन्दगी में जीते रहते हैं।
इतना समझ लें,जिसे आप दूर से देखकर बेचैन हो उठते हैं।उसके नज़दीक़ मत जाइये।दूर से आपको भी ख़ुशी मिलेगी और उसको भी कोई तक़लीफ़ नही होगी।किसी के इतना नज़दीक़ भी मत जाए की उसकी बदबू नाक तक आने लगे।इन्हें दूर से देखिये,दूर से यह ध्रुव तारे नज़र आते हैं, करीब से सिर्फ यह चूने का ढेला भर हैं।इसलिए दोस्त किसी की कुछ चमक से बेचैन मत होना।अगर बेचैन होना तो करीब पहुँचकर अँधेरा देख अफसोस न करना।नाक पर रुमाल रखकर उस शख्सियत को बर्दाश्त कर लेना।बेचारे इंसान ही तो हैं।हाँ मगर ऊपर वाला मुहावरा गढ़ने वाले अंजान दार्शनिक को एक मुस्कान दे देना की वाक़ई ढोल करीब आने पर हमने कानों में रुई लगा ली थी।
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