" अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम ।"
शायद कभी पढ़ा होगा या सुना भी होगा,अर्थ भी जानते होंगे।संस्कृति की रक्षा के शोर में वास्तविक संस्कृति के यह सुर हल्के लगने लगे शायद मगर ऐसा नही है।इनके हर लफ़्ज़ में हम हैं।इसमें माटी की अजब खुशबू है,ये ज़मीन मोहब्बत की ज़मीन हैं।यह भी तो देखो की जो परिवार को एक करता है उसके हिस्से में ज़्यादा दर्द,ज़्यादा त्याग और ज़्यादा ज़िम्मेदारी आती है।कोई भागे तो भागे हम अपने पूरे परिवार को एक करने से कैसे पीछे हट सकते हैं।मेरे लिए इन शब्दों से एक रूह वाला रिश्ता है, जिससे हटना अधर्म है।
आर्यो ने भी इसकी खूबसूरती को परखा और उतारा है।इस्लाम ने भी इस ज़मीन को छूते ही अलग निखार देखा है।सुफ़िज़्म यहाँ की माटी से बुलंदियों पर पहुंचा है।अँगरेज़ भी इस मिटटी में सौंधे हो गए,उनमे भी अध्यात्म की चमक आ गई।
यह वही ज़मीन है जो दुनिया को पूरा एक परिवार कहती रही हैं।जो अपनी मोहब्बत से हर सोच को मीठा कर देती है।जो अपने दामन में छुपाकर हर एक को अपने जैसा कर देती है।जिसके ज़र्रे ज़र्रे में मोहब्बत का अजीब सौंधापन है।जो हर एक को अपना बना लेती है।हो सकता है कुछ लोग यह ना सोचे,ना सोचे तो ना सोचे।वो अपने आप से धोखा कर रहे हैं,करने दे।वो एक सिरे में उलझे रहेंगे।मगर आप वसुधैव कुटुंबकम को समझये, महसुस कीजिये।
देखिये आपसे एक अलग खुशबु आएगी।
मानवता को उठकर संभाल लीजिए।आज दुनिया को आपकी ज़्यादा ज़रूरत है।नफरत को हमारी ही माटी खत्म कर सकती है।हमारे आदर्श ही रौशनी दिखा सकते हैं।हमारे ही आँगन से उठा नौजवान मोहब्बत से दूसरों को गले लगा सकता है।उठकर दुनिया को गले लगा ले।बता दे की मोहब्बत क्या होती है।तुम नफ़रत को घुटनों के बल बैठाने की कूव्वत रखते हो।
मुझे पता है की अगर इस माटी से निकला कोई भी शख्स तय करले की उसे लोगों को जोड़ना है, तो तुम देखना उसके इर्द गिर्द कितने लोग खुद बखुद जुड़ जाएँगे।यही मोहब्बत से सबको एक करते हुए चलना ही तो कृष्ण की चाहत थी।यही तो रास्ता राम का रास्ता है।वेद का रास्ता है।बुद्ध,ईसा, मोहम्मद का रास्ता है।उठो दोस्त इस शाम को सुबह की ज़रूरत है।वो सुबह जो गरीब के होंटो पर मुस्कान बिखेरीगे।जो दिलों को खुशहाल बना देगी।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Saturday, February 18, 2017
कुटुम्ब
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hafeezkidwai
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