Monday, February 20, 2017

फ़ालतू लिख गए

मैं आज लिख नही पा रहा हूँ।चाहता हूँ फैलती हुई नफ़रत पर लिखूँ तो दिमाग कहता है कहाँ है नफ़रत,किसको देख कर लिखोगे नफ़रत के खिलाफ।तब मैं उनको देखता हूँ जिनसे मिला हूँ या जिनसे मिलता हूँ या कहें जिनसे रोज़ मिलता हूँ।उनमे से तो किसी में नफ़रत नही है।
फिर मैं उनपर क्यों कलम धरूँ जो दूर कहीं आग उगल रहे हैं।उनको क्यों शब्दों में बाँधू जो खुलेआम दिल तोड़ रहे हैं।मैं उन लोगों को तवज्जे ही क्यों दूँ जो हमारे बीच की मोहब्बत की खुशबू को बदबू में बदलने बैठे हुए हैं।मैं इनपर क्यों वक़्त ज़ाया करूँ।
मुझे लगता है दूर स्टेज पर चुनाव में वोट पाने के लिए लार टपकाते नेता की आग उगलती ज़बान से बेहतर है अपने साथ चलने वाले उनको लिखूँ,जिनका होना हमे ताक़त देता है।मेरे हीरो तो वोह हैं जिनके साथ मुझे सुक़ून मिलता है।क्या हम नफ़रत के इतने भूखे हैं की अपने यहाँ के तो छोड़ ही दें,पड़ोस के भी कुछ नफ़रत बाटने वालों को कालीन पर बैठा रखा है।तो क्या अब इसपर कुछ बात करके हम अपना वक़्त नही बर्बाद करेंगे।
जिन्हें वाक़ई सुक़ून चाहिए वोह दूर दुनिया की आग की तपिश को बुझा सके तो उठे वरना खुद आग उगल कर उस आग को और न बढ़ाएँ।अपने इर्द गिर्द।उन चेहरों को पहचाने जिनके होने से आपके चेहरे पर मुस्कान आती है।उन्हें पास रखें।वही आपके हीरों हैं वरना यूँ सियासी मेढक तो अँगारे छिटकाते ही रहेंगे।
मुझे अपने दोस्तों का साथ पसन्द है, बस एक यही लाइन मुझे हर लाइन की तक़लीफ़ से दूर रखती है।सियासत से इतर मोहब्बत के चबूतरे पर,दोस्ती की कुर्सी पर बैठ मुस्कुराइए बाकि इन आग उगलते लोगों को कॉमेडी शो के किरदार समझये तो तफ़रीह और आएगी।इनको सबको evm में कैद करके दोबारा ज़िन्दगी में उत्पात मचाए रखने के लिए मत याद कीजिये।लिखना नहीं था क्या क्या लिख गए।खैर मुस्कुराइए की हम अब तक नही लड़े,भरसक कोशिश के बावजूद रहीम राम को टिकाकर चाय पीते रहे....

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