मैं कहता हूँ जब तुम प्योर दूध के लिए घँटों घोसी की चौखट पर बैठ सकते हो,शुद्ध घी के लिए 20 किलोमीटर दूर जा सकते हो तो खुद को शुद्ध करने के लिए थोड़ा वक़्त क्यों नही दे सकते।मैं नही कहूँगा की तुम जंगलो की ख़ाक छानो, या आसमान पर पाँव धर दो।बस अपनी पिछली किताब को दोबारा खंगालो।जिन नामो को कभी भी पढ़ा हो और वोह याद हों तो उन्हें दोबारा टटोल कर पढ़ो।
पायथागोरस प्रमेय तो याद होगी है।या याद न सही तो पायथागोरस तो नाम सुना होगा।एक बार उन्हें उनकी प्रमेय से अलग झाँक कर देखो।मैं तो हैरत में हूँ की इतने बड़े दार्शनिक को प्रमेय की पहचान में कैद कर दिया।यह देखो उसने अपने दिल में झाँक कर कैसे समाज को एक किया।कैसे एक गणितज्ञ ने दर्शन का वोह सिद्धान्त रखा की दिल गुलाबी हो गए।
पाइथोगोरस की समझ धार्मिक और वैज्ञानिक थी, उनकी नजर में विज्ञान और धर्म एक दुसरे से सम्बंधित हैं।वह आत्मा के पुनर्जन्म में विश्वास करते थे।उनका मानना था कि आत्मा जब तक सदाचारी नहीं हो जाती तब तक वह मानव, पशु या पेड़ पौधों में बार बार अवतार लेती रहती है। उनका पुनर्जन्म का विचार प्राचीन यूनानी धर्म से बहुत हद तक प्रभावित था।पायथागोरस पहले इंसान थे जिसने यह प्रस्तावित किया की विचार,प्रक्रिया और आत्मा दिल में न होकर मस्तिष्क में स्थित है।
पाइथोगोरस का एक विश्वास यह था कि जीवन का सार संख्या है। इस प्रकार से, सभी चीजों की स्थिरता ब्रह्माण्ड को बनाती है। स्वास्थ्य जैसी चीजें तत्वों के एक स्थिर अनुपात पर निर्भर करती हैं; किसी भी चीज का बहुत कम या बहुत ज्यादा होना एक असंतुलन का कारण होता है जो किसी भी जीव को अस्वस्थ बना सकता है। वे विचारों की तुलना संख्या की गणनाओं से करते थे। जब दर्शन लोक सिद्धांतों से जुड़ जाता है तो वह विश्वास बन जाता है कि जीवन के सार को संख्याओं के रूप में खोजा जा सकता है।
मैं कहता हूँ की अगर तुम्हे वाक़ई समाज में निर्माण को आगे लाना है तो पायथागोरस जैसी ईंटों को पहचानो।उन्हें पढ़ो,खोजकर पढ़ो ताकि तुम्हारे पास कोई कमी न रह जाए।मैं उन दिमागों के लिए कभी नही कुछ कहता जो भीड़ की तरह चल रहे हैं।मेरे लिए वोह अहम् हैं जिनको मुल्क़ के लिए तड़प हैं।जो देश बनाना चाहते हैं तोड़ना नही।जो दिल जोड़कर मुल्क़ की इमारतों को खुशहाल बनाना चाहते हैं।वोह सब उठो और हर उसके काम को देखो जिसने ज़ीरो से शुरआत की थी।पायथागोरस उसी में आगे आगे झण्डा लिए खड़े मिलेंगे दोस्त।
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