इर्द गिर्द अथाह दोस्त।जिससे एक बार मिल लिए उसके दिल में अपना हिस्सा बना गए।तक़लीफ़ के बावजूद मुस्कुराना ताकि दोस्त उनके दर्द पर मायूस न हों।अपनी स्कूल फ़ीस से दोस्तों की ज़रूरतें,उनकी फ़ीस जमा कर देने के बाद जब उन्हें खुद सज़ा मिलती तो वोह मुस्कुराते रहते।किसे पता था की बचपन में दोस्तों पर सब कुछ लुटा देने वाला यह शख्स एक दिन इस माटी पर अपने आप को पूरा खत्म कर देगा।
नेहरू के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने पर भी जब उनका कोई दोस्त उनको याद करता तो वोह खड़े मिलते।यहाँ तक अपने दुश्मन के घरों में भी उनके एहसास और ख़िदमत के चर्चे थे।मुल्क़ बटा तब लोगों ने देखा की कम बोलने वाला और शर्मीला सा उनका लीडर कैसे दूसरों के पाँव के काँटे चुन रहा है।पूरा घर शरणार्थी कैम्प में बदल चुका था।हर एक की भूख में वोह निवाला लिए खड़े थे।
सोचिये कभी यह हुआ है की किसी के दोस्तों के पूरे समूह को उसका नाम दे दिया गया हो।उनके दोस्त अपने आप को रफियन कहकर फ़ख्र से मुस्कुराते थे।आज रफ़ी अहमद क़िदवई का जन्मदिन है।किस्से बहुत हैं लिखने के लिए मगर उससे ज़्यादा चीज़ें हैं ज़िन्दगी में उतारने के लिए।नेहरू को उनके इंतेक़ाल के बाद जब पता चला की उनके ऊपर लाखों रुपयों का कर्ज़ा है और घर की दीवारें कच्ची हैं, तो वहीं, मसौली में उनके आँगन में रो दिए।देश का इतना कद्दावर नेता इतना ईमानदार,नेहरू काफी देर रोते रहे।
मैं नही कहता की उनकी तुम जयकार करो मगर यह तो सोचो की इस मुल्क़ की बुनयाद में कैसी कैसी ईंटे थीं।एक बार उनको पढ़कर तो देखो मेरा यक़ीन करो तुम्हारे दिलों से नफ़रत कहीं दूर छिटक कर दम तोड़ देगी।रफ़ी अहमद क़िदवई को आज याद करके देखिये।वोह ज़रूरत हैं मुल्क़ की।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Friday, February 17, 2017
रफ़ी अहमद क़िदवई
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hafeezkidwai
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