वोह जब बचपन में बेत खाने की सज़ा पा रहा था तो सबने सोचा था की बच्चा है, डर जाएगा।नँगे जिस्म पर जब काला बेंत कत्थई निशान छोड़ता तो बड़े बड़े सिमट कर बैठ जाते,वोह तो बच्चा था।हर बेंत अपना निशान छोड़ता और हर बार उसकी ज़बान दर्द और राल के साथ मुल्क़ का नारा बुलन्द करती।यह नारा मारने वाले को बेचैन करता तो वोह और तेज़ हाथ चलाता।इस तरह उसकी सफ़ेद पीठ पर तब तक ज़ुल्म के निशान पड़ते रहे जब तक वोह बेहोश नही हो गया।
बचपन में मुल्क़ के लिए देखा ख्वाब जब उन बेंतों से नही कमज़ोर हुआ तो बाद में तो इसे बढ़ना ही था।जवानी के जोशीले दौर में उसने लपक कर अपने तरह के हर नौजवान को सहारा दिया।लोग तो उन्हें क्रांतियों से याद रखते हैं।मैं बताता हूँ उससे पहले की जाने वाली अथक मेहनत को।वोह ख़ामोशी से गाँव में निकल जाता,देखता कोई तो नौजवान हो जिसका ख़ून ज़ुल्म के खिलाफ उफान मारता हो।
वोह भूखा, प्यासा बस संगठन को मज़बूत करने के लिए पगडंडियों पर भागता रहता।कब गाँव से शहर निकल जाते पता ही नही चलता।पूरे संगठन को नैतिकता के साथ चलाए रखना भी तो उसकी ही आर्ट थी।नौजवानों के जोश को एक दिशा देना भी तो उसे ही बखूबी आता था।लोग उसके खूबसूरत और जोशीले शरीर और हावभाव से आकर्षित होकर इकट्ठे होते रहे।गंगा यमुना के किनारों पर उसकी बुनी शख्सियतें अंग्रेज़ों को लगाम लगाने को काफी थीं।
मैं बात कर रहा हूँ चन्द्र शेखर आज़ाद की।उस आज़ाद की जो आज के ही दिन शहीद हुआ।जो किसी भी हाल में अँगरेज़ की कैद से बेहतर मौत को समझता था।जिसके सीने में इतना कुछ दबा था की आज़ादी के आंदोलन को कुचला जा सके।जिसके पास नरम गरम सब तरह के लीडरों के अथाह राज़ थे।उसे पता था यह सब अंग्रेज़ों के हाथ लगने से पहले खत्म होने होंगे।
उसे पता था की कहीं उसे इतना ज़ुल्म न दिया जाए की उसकी तक़लीफ़ को देख कोई उसका साथी टूट जाए और राज़ बाहर आ जाए।वोह इतना संवेदनशील था की अपने मामूली से मामूली साथी के लिए दुश्मन पर झपट पड़ता था।मैं कहता हूँ आज़ाद को वैसे मत पढ़ो जैसे लिखा गया है।उनकी संगठन क्षमता,लड़ने के तरीकों और साथियों के लिए सहारा बनने की कला को देखो।ऊपर से आज़ाद की सबको साथ लेकर चलने की खूबी को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।
हो सके तो आज शहादत के दिन आज़ाद की एक वोह ही खूबी अपना लो जो मुल्क़ के लिए ज़रूरी है।आज़ाद की माटी और माटी के हर तरह के लोगों के लिए जो मोहब्बत थी वोह बेमिसाल थी।औरतों के लिए जो इज़्ज़त थी,उसका कोई जवाब नही।वोह चीखते नही थे बल्कि करते थे।जो भी देश के लोगों में फ़र्क करेगा वोह आज़ाद के रास्ते का तो है ही नही।एक बार पलट कर देखना की इस माटी को किसने किसने सींचा है।किसके ख़ून से इसकी बुनयाद मज़बूत हुई है।आज़ाद को सलाम या नमन से पहले मुल्क़ के हर नागरिक की इज़्ज़त और मोहब्बत को दिल में पैबस्त कर लेना,आज़ाद खुद बखुद आपको देख लेंगे।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, February 26, 2017
चन्द्रशेखर आज़ाद
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hafeezkidwai
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