Sunday, September 17, 2017

आशिक़ी सोलहवीं

मैं जब ऑफिस में बैठकर लिखता हूँ तो खो जाता हूँ।सब बैठे रहते हैं, मैं बात किया करता हूँ मगर मैं वहाँ नही होता हूँ।यही बात तो उसे मेरे नज़दीक़ लाती थी।दो चार उसके चम्मच मेरे इर्द गिर्द बैठते और उसे बताते की भाई कोई भी बैठा हो बात करते करते कहीं खो जाते हैं।वह तुम्हे इस क़दर याद करते हैं की उनके हर आर्टिकल में नज़्म का मज़ा तुम्हारे एहसास से ही आता है।
खुद आशिक़ बनने की तमन्ना की कब्र दिल में समेटे यह दोचार राल टपकाते भाइयों के कहने पर वह दिनभर कुलांचे भरती।कोई न कोई बहाना बनाकर अगर वह ऑफिस में दाखिल न हुई तो मेरे ऑफिस की दीवारें भी शिकायत करतीं।

खैर मैं इस बेखबर इश्क़ के साय में रफ्ता रफ्ता बढ़ता रहा।एक दिन वह पानी माँगने आई।हमे लगा उनके मुंकिन नकीर आए नही हैं तो खुद अपने पाँव को तक़लीफ़ दी है।मैंने वाटर कूलर से बोतल भर दी।वह भड़क गईं,मुझे यह पानी नही चाहिए।मैं सकते में की एक दो कमरे के ऑफिस में पानी की वैरायटी लाऊँ तो लाऊँ कैसे।कोई पानी की दुकान तो है नही,तो मैंने बेमुरव्वती से कहा यही एक पानी है, लेना हो लीजिये वरना रहने दें।
वह बोली झूठ बोल रहें हैं आप की एक यही पानी है।क़सम से मेरे ज़हन में एक यही पानी था की दिमाग के गन्दे हिस्से ने हरकत की कि मैं पानी पानी हो गया।सुर्ख़ लाल होता हुआ बोला आप दिखाओ दूसरा पानी कहा है।उसने  ऑफिस में लगे ऐसी से बून्द बून्द टपकते पानी की तरफ इशारा किया।बाल्टी उससे आधी भरी थी,मैंने भी खिसियाते हुए उन्हें वह पानी दे दिया।वह उस पानी को पवित्र जल की तरह दिल से लगाए भाग गईं।बात आई गई हो गई,उनका रोज़ का दस्तूर हो गया की ऐसी से निकला पानी लेकर जाने का।।।

एक दिन वह,उनके चम्मच सब इकट्ठा थे।आफ़त के मारे हमने पूछ लिया की यह ऐसी से निकला पानी करते क्या हो,पीने वीने लायक तो होता नही।तब चम्मच बोलते उससे पहले वह बोल उठी की यह आपकी मोहब्बत है जो बिना कंजूसी आप मुझे यह दे देते हैं।मैं पूरे पानी से अपने मुँह को धोती हूँ।हाथ को धोती हों,धोना क्या कहें मालती हूँ।एक ऐसी कैफ़ियत तारी होती है जैसे आप हमारे इर्द गिर्द हैं।
मुझे लगा की पहुँचे हुए बुज़ुर्ग के गुसल के पानी की फ़ज़ीलत बयान कर रहीं हैं।मैंने पूछा मोहतरमा इससे हमारा क्या ताल्लुक़।एक झटके में वह बोली ऐसी अंदर बैठे आपके जिस्म के इर्द गिर्द इकट्ठी नमी को खींचकर ही तो बाहर निकलता है।यह जो बून्द बून्द पानी इकट्ठा होता है, यह आपके जिस्म को छूकर आने वाली वह पाक शफ्फाक बूंदें हैं जिन्हें पलकों पर बैठा लेना चाहिए।इसकी हर बून्द में मुझे आप दीखते हैं।जब यह मेरे जिस्म को छूती हैं तो यक़ीन जाने आप कहीं भी हों,मेरे पास ही तो होते हैं।।।।

पास पड़ी फूल झाड़ू उठाकर मैं दौड़ता हूँ,ऐ पागलों की जमात अगर इधर दोबारा नज़र आईं तो पानी में डुबो डुबो कर मारेंगे।कमबख्त।सब भागते हैं, मैं एक जुमला उछालता हूँ।उस ऐसी के पानी में थोड़ी थोड़ी तुम्हारे लगवों भगवो की भी बुँदे हैं।कमबख्त मेरी आड़ में तुम तक पानी बनकर पहुँच रहें हैं।सम्भल जाओ या उन्हें सम्भाल लो मगर दोबारा इधर दिखाई नही देना और इस तरह एक और मोहब्बत का गला घोट मैं अगली कहानी की तरफ बढ़ गया।

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