Wednesday, September 13, 2017

हिंदी दिवस

व्यौहार राजेन्द्र सिंह एक मेहनत कर रहे थे,ऐसी मेहनत जो पूरे देश को।एक सूत्र में बाँधती।लगातार बैठको का दौर जारी था।लम्बी लम्बी बहसें होती मगर एक राय बनना मुश्किल था।सब चाहते तो थे की पूरे देश की भाषा एक हो मगर देश की विविधता देख उनके हौसले पस्त हो जाते।जहाँ हर सौ किलोमीटर पर पानी अपना स्वाद बदल लेता हो,जहाँ हर सौ किलोमीटर पर बोली बदल जाती हो,परम्पराएँ,संस्कृति,खानपान बदल जाता हो वहाँ एक भाषा का सपना एक खूबसूरत ख्याल ही हो सकता था।

खैर राजेन्द्र सिंह जी तमाम साहित्यकारों के साथ एक भाषा की मुहीम चलाते रहे।नेहरू जी के कहने पर राजभाषा आयोग,राजभाषा प्रचार समिति और तमाम चीज़ें बनी,नेहरू ने देश घूमा था,पूरा देश,तो वह वास्तिविकता समझते थे की यह कठिन और दुरूह है।फिर भी प्रचार के माध्यम से हिंदी को बढ़ावा देने के पक्ष में थे।वह नही चाहते थे की लोग ज़बरदस्ती अपनी बोली,संस्कृति से पीछा छुड़ाएं बल्कि अपने दिल के एक हिस्से में हिंदी के लिए अलग से स्थान रखे।खैर राजभाषा के लिए जितनी बैठकें हुई उतनी तो देश के नक्शे को बाटने में भी नही हुई।

अंत में बिना सब जगह एक भाषा की छाप के 1953 में व्यौहार राजेन्द्र सिंह के जन्मदिन 14 सितम्बर को ही हिंदी दिवस की मान्यता मिली।सबने तय किया की बिना ज़ोर ज़बरदस्ती इसी दिन से हिंदी का प्रचार होगा और एक दिन खुद बखुद यह आम भारतियों की भाषा हो जाएगी।यह सच है इसी दिन से भाषा के नाम पर होने वाले बड़े झगड़े शांत हो गए और धीरे धीरे प्रचार शुरू हुआ मगर सरकारी बाबू कब तक यह दिवस मनाते,एक खानापूर्ति बनकर यह भाषा आयोग में पलथी मारकर बैठ गया।लम्बे अरसे बाद भोजपुरी,मराठा,हिंदी की लड़ाई लोगों ने महारष्ट्र में देखी।

वक़्त बेवक़्त देश के नेता अपने क्षेत्र की भाषा बोलकर अपने क्षेत्र के वोट लपकते रहे हैं।यही वजह है की हिंदी का दायरा सिर्फ हिंदी प्रदेशों में रह रहा है।अच्छा यह है की इस देश में आप कहीं भी हो,थोड़ी बहुत हिंदी लोग समझते हैं।आज हिंदी दिवस है ताज्जुब तो यह है की बहुत सी सामान्य ज्ञान की पतली किताबों में हिंदी दिवस 15 सितम्बर लिखा है।खैर छोड़िये,जितना हो सके हिंदी का प्रसार कीजिये।वैसे ही जैसे गाँधी जी ने बीबीसी के पत्रकार को यह कहकर लौटा दिया था की जाओ उससे कह दो गाँधी अंग्रेजी भूल गए हैं....

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