Holy Facebook की क़सम जब लिखने चलते हैं तो इतने क़िस्से याद आते हैं की उँगलियाँ चिढ़ने लगती हैं।शिकायत करती हैं की क्या अल्लम् गल्लम् लिखवाते रहते हो,जबकि दिमाग कहता है यह क़िस्सा नायाब है।अब उँगलियों से कौन कहे की तुम मज़दूर हो और दिमाग शासक।अब शासक का आधी रात में भी जो मन में आए वह कहे,उसे पूरा करना तुम्हारा काम है।वैसे उँगलियाँ चाहे जितना थकी हों,दिमाग के आदेश को टालती नही है और एक से एक फ़ालतू के पोस्ट लिखकर सुस्ताती रहती हैं।
हाँ तो देखें बात कहाँ चली गई,उँगलियों से याद आया दिमाग के मगरूर होने का किस्सा।अभी दो चार दिन पहले ढेर सारे बूढ़े लोगों से साफ्का पड़ा।सब एक से एक मुँह के क़ाबिल।सबसे पास देश की टॉप लीडरशिप के घरेलू किस्सों का अम्बार।अच्छा थोड़े ऐसे बुद्धिजीवी बड़े खतरनाक होते हैं जिन्हें कुछ मिला नही होता है मगर क़द बड़ा होता है।वह लीडरशिप के ऐसे अंतरंग क़िस्से बाहर करते हैं की नौसिखिये राल टपकाते हुए चाव से सुना करते हैं।
खैर उन सबसे क़ाबलियत में छ गज छोटे हम,ऊपर शक्ल ओ सूरत में उन सबों के पोते जैसी काया।उन्हें लगा हमारे बीच कौन बच्चे बैठा है जो अमीर खुसरु पर भी लुकमे दे रहा है और जायसी पर भी।तो बड़े मगरूर अंदाज़ में एक जनाब ने गाँव तकिया पर लुढ़कते हुए कहा,क़िदवई साहब,यहाँ मौजूद हम सब ज़्यादातर एक ही यूनिवर्सिटी ने निकले हुए दानिशमंद हैं।तपाक से हमने कहाँ जी,मुझे पता है की "आप सब एक ही ऐशट्रे की बुझी हुई सिगरेट हैं।"
यह बोलना था की सब चुप हो गए,उनमे से एक खुशमिजाज़ और उन सबमें सीनियर साहब ने कहा,भाई क्या जुमला उछाला है।अब यह दोबारा नही बोलेंगे।मेरे लिए बड़े काम का है, जिसे आपने ऐशट्रे कहा है, वाक़ई अब वह ऐशट्रे हो गई है।पहले वहाँ रूह में आग पैदा की जाती थी,अब तो अच्छे अच्छे की आग ठण्डी करदी जाती है।बुझा दी जाती है।आपके लफ़्ज़ हरफ़ बहरफ़ सच्चे हैं।
मुझे इससे क्या,मैं तो बोला और निकल लिया।दिमाग का क्या,सोचा और निकल लिया।बेचारी मज़दूर उँगलियों को इसे भी लिखना पड़ गया।
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