Monday, September 11, 2017

विनोबा

विनोबा का एक क़िस्सा हमसे भी सुन लीजिये,कोई नही सुनाएगा।एक बार कहीं जाने के लिए अपने साथियों के साथ विनोबा लखनऊ आए।लखनऊ में बस स्टैण्ड तक पहुँचे।बस में ज़बरदस्त भीड़ थी।लोग तले ऊपर चढ़े जा रहे थे।कंडक्टर के पास उनके एक साथी ने कहा की हम आठ दस लोग हैं, हमे बीही जाना है।कंडक्टर ने कहा यहाँ कहाँ जगह है, अगली बस से जाओ।उसके बहुत कहने पर भी कंडक्टर ने चढ़ने ही नही दिया।

उनके साथ एक बूढ़ा आदमी था,जिनको मामूली सा भाँप,उन्होंने बस में बिना चढ़ाए,झिड़क दिया।बस आगे बढ़ गई।बस बाराबंकी पहुँचती की उससे पहले कंडक्टर सस्पेंड हो गए।पता चला उन्होंने विनोबा भावे को बस में चढ़ने नही दिया।अब लगे इधर उधर की सिफारिश में मगर कोई रास्ता नही।महीने भर के बाद किसी ने सुझाया की विनोबा ही तुम्हे बहाल कर सकते हैं,उन्ही के पाँव पकड़ लो।बेचारे विनोबा के पास पहुँचे और माफ़ी तलाफ़ी की,आखिर विनोबा पसीज गए और जनाब वापिस नौकरी पर लौटे।

यह क़िस्सा मैंने खुद उन कंडक्टर साहब से सुना था।सुनाते में वह बताते रहे की इतना सादा इंसान,गन्दी सफ़ेद चादर,बेतरतीब सफ़ेद पीली दाढ़ी,हमे लगा कोई होगा गाँव सांव का मगर भय्या उस दिन से कान पकड़ा की कोई हो,उसे झिड़कना नही चाहिए मगर वह इतने ही सीधे तो हमे सस्पेंड नही करवाना चाहिए था।डाँट लेते,मार लेते।अब इन्हें कौन बताए वह अहिंसक विनोबा थे।खैर विनोबा की ज़िन्दगी खुद में एक सन्देश है,बहुत कुछ सीखने के लिए।गाँधी जी की छाँव जिनपर पड़ी,उनमे विनोबा ही तो थे जो लम्बे वक़्त तक उन्हें जीते रहे।विनोबा भावे के बहुत से किस्से याद हैं मगर करें क्या,यह मन मानने को तैयार ही नहींकी लोग अभी भी इन्हें या इनके जैसे किरदारों को पढ़ना चाहते हैं।

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