Monday, September 25, 2017

कलम

#कलम

टाइपिंग ने क़लम की अहमियत को धुंधला कर दिया है लेकिन जिनकी यादें इनसे जुड़ी है वो कभी इन्हें भुला नही पायंगे....मुझे ग़ालिब का एक शेर याद आता है..

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में
ग़ालिब सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है

"सरीर" उस आवाज़ को कहते है जो सरकंडे के क़लम से कागज़ पर निकलती है ग़ालिब को ये आवाज़ बहुत पसंद थी
मुझे भी खुरदुरे कागज़ पे पेन की आवाज़ बहुत पसंद है...

कलम कई तरह के हुए है अलग अलग जहां अलग चीज़ों से बने हुए।

नरकुल से जिन्होंने लिखा होगा या क्लिक से...

क्लिक भी एक तरह का दरियाई नरकुल है भूरे रंग का पतला सा ये कलम नरकुल से भी बहुत मज़बूत होता था उसकी नोक घिसती नही थी और कम इंक में ज़्यादा लिखा जा सकता था

सबसे बड़ी बात ये है कि ये ब्लेड से नही कटता था इसके लिए तेज़ चाकू की ज़रूरत पड़ती थी.... जो लोग उर्दू या अरबी लिखते थे वो इसकी नोक बीच से काट देते थे जैसे आजकल निब होती है

बहुत लोग सेठे से भी लिखते थे।

उसके बाद होल्डर आया इसमें G निब अलग से लगती थी.... ये निब आम निब से लंबी होती थी और आजकल की तरह आगे पॉइंट पे गोल नही थी, उसके  ऊपर G बना होता था।

होल्डर लकड़ी का होता था.... आगे लोहा जिसमे निब फिट कर दी जाती थी। इससे बेहतरीन उर्दू या अरबी किसी और कलम से नही लिखी जा सकती।

मैनें नरकुल से लिखा है लेकिन स्कूल में फॉउंटेंन पेन से लिखना शुरू किया था पांच रुपये का पेन आता था जिसमे ड्राप से इंक भरते थे सस्ता होने का ये नुकसान था कि उंगलिया इंक से खराब हो जाती थी।

उसी दौरान कुछ पेन ऐसे भी आये जिसमे ड्राप लगा हुआ था उसमें इंक अलग ड्राप से भरना नही पड़ती थी वो खुद ही "सक" कर लेता था।

जूनियर क्लास में डॉट पेन इस्तेमाल करने का मौका मिला एक नया पेन आया था "सेलो ग्रिपर" बहुत बारीक लिखता था कई बार इसकी रिफिल के पॉइंट से बॉल गिरकर वरक़ पे लुढ़कने लगती थी हम लोग फिर से उसे लगा लेते लेकिन वो स्मूथनेस नही आती थी

जेल पेन का भी चलन आया, खासकर एग्ज़ाम में उसी से लिखा जाता था।

एक और नया पेन था पायलेट उसका भी अलग जलवा था 35 रुपिये का आता था। कुछ ही स्टूडेंट्स के पास होता था

मेरी टीचर्स के पास रेड रिनॉल्डस रहता था मुझे हमेशा से ब्लू वाले से उलझन रही....

हाई स्कूल में मैनें जाना कि एक पेन "पारकर" भी आता है सैंकड़ो से लेकर हज़ारो रूपियो तक, कुछ में  तो गोल्ड की निब होती थी......एक दो साल बाद दो हज़ार का पारकर खरीद कर शौक पूरा किया था।

चार रिफिल वाला पेन भी लाजवाब था एक साथ बटन दबाकर चारो रिफिल निकालने की बेवकूफ़ी सबने की होगी...

स्टूडेंट का रेड पेन रखना उस वक़्त अफीम रखने से बड़ा गुनाह माना जाता था। मेरी तो इस बात को लेकर कई बार पिटाई हुई थी।
एक बार ग्रीन पेन से होम वर्क कर लिया था टीचर ने फ़र्ज़ी कहानी बताकर पीट दिया कहने लगे ग्रीन पेन प्रेजिडेंट यूज़ करते है... कभी भी मेरी मुलाकात प्रेसिडेंट से हुई उनसे इस बारे में ज़रूर पूछूँगा।

बहरहाल कलम के बहुत किस्से  कहाँ तक लिखूं लेकिन आज भी मुझ स्क्रीन पे टाइपिंग के मुकाबले वरक़ पे कलम से लिखना ज़्यादा पसंद है।

No comments:

Post a Comment