Thursday, September 7, 2017

ब्लू व्हेल

शक शक शक्तिमान...हाथ को ऊपर करके,ऊँगली आसमान में घुसेड़ने की अदा के साथ बवंडर की तरह नाचते शक्तिमान भला किसे नही याद होंगे।यह धारावाहिक हर उस घर में देखा जाता रहा,जहाँ बच्चे थे।खूब देखा जाता,हमारे यहाँ चलन भी है, जिस किरदार की ड्रेस गाँव की बाजार में बिकने लगे,तो भला वह सीरियल कहाँ रह जाता है, सीरियस हो जाता है।शक्तिमान को देख हमे हमेशा लगा हम लोग टीवी से हाँके जाने वाले लोग हैं।हमारी ज़िंदगियों पर टीवी,सीरियल,फ़िल्म बड़ा असर डालती हैं।तभी तो हमे न्यूज़ चैनलों की चबर चबर पर जनता का अन्धविश्वास बुरा नही लगता है।क्योंकि यह सच है की रिमोट हमारे हाथ में होता भले है मगर टीवी ही हमे चला रहा होता है।

लियो बात करते करते कहाँ चले गए।हाँ तो शक्तिमान के वक़्त एक पूरी जेनरेशन रही है जो खुद शक्तिमान बनकर भारत की सारी समस्या हल कर देना चाहती थी।हम लोग,जिन्हें हर पल एक अवतार की ज़रूरत होती है, जब नही होते तो टीवी में गढ़ लेते हैं।शक्तिमान का ज़िक्र सिर्फ इसलिए की सोचिये वह कौन बच्चे थे जो छत पर खड़े होकर,कमर पर हाथ रखकर,एक हाथ से आसमान की तरफ ऊँगली करने की दशा में नाचते हुए बेल जैसे नीचे आ जाते थे।कुछ के हाथ पैर टूटते तो कुछ गुज़र ही गए,उनकी आत्मा को शाँति मिले क्योंकि शक्तिमान अभी तक नही आया।

अब ज़रा आज के वक़्त लौट आइये।ब्लू व्हेल गेम का नाम सुना है।यह बड़ी तेज़ी से हमारे बच्चों को लील रहा है।अरे अस्पताल में नहीं, घर में।एक ऐसा गेम जिसे खेलते खेलते मरना ही है।आत्महत्या करनी है।मैंने सोचा की कौन से बच्चे होंगे,जो यह सब कुछ जानकर मूर्खता करते होंगे तो यक़ीन जाने ब्लू गेम जेनरेशन के ही पूर्वज शक्तिमान तक जा पहुँचे।हमारे बीच ऐसे कितने लोग हैं जो टीवी,मोबाईल,कम्प्यूटर के बाहर दुनिया देखते ही नही है।अजब कल्पना लोक में जीते आए हैं।

अब यह ब्लू व्हेल गेम खेलते बच्चों के माँ बाप देखें की अगर बच्चे को दोस्तों में डाला होता।डस्ट से बचाते न,बल्कि पार्क में खेलने देते।धूल मिटटी धुप फाँकने देते तो शायद यह गेम,उन बच्चों की जान नही लेता।बच्चों को दिखाते की गरीबी खुद में ब्लू व्हेल है, जिसे बहुत से बच्चे न चाहकर भी झेल रहें हैं।मर रहें हैं।उन्हें ज़िन्दगी की अहमियत सिखाते।जो बच्चा अपनी ज़िन्दगी की अहमियत नही समझेगा,भला वह किसी दूसरे की ज़िन्दगी को अहमियत देगा।वक़्त बेवक़्त दूसरे को मारेगा या खुद को मारेगा,बिना दर्द,बिना संकोच,बिना संवेदना के।।।इसमें बच्चों की कोई गलती नही,गलती बड़ो की है, सिर्फ बड़ो की।।हो सके तो उम्र से या सफ़ेद बालों से बड़े मत होईये,दिमाग से बड़े होईये और बच्चों को ज़िन्दगी से रूबरू करवाइये।वरना रोज़ कोई ऐसा गेम,कोई शो या कुछ और आएगा,बच्चों को ज़िंदा निगल जाएगा।

पहले खुद को टीवी के रिमोट से चलना रोकिये,फिर बच्चे भी रुक जाएँगे।पहले खुद सच देखना सीखिये,फिर बच्चे भी सच देखने लगेंगे।पहले खुद को इंसान बनाइये,बच्चे इंसान बन ही जाएँगे।ब्लू व्हेल गेम बहुतों को खा रहा है, गम्भीरता को समझये।हम लोग भले मुँह नुचवा,चोटी कटवा,कैलन्डर को दूध पिलाने,पत्थर बनने की घटना पर विश्वास करने वाली पीढ़ी हों मगर अपने बच्चों को ऐसी मूर्खताओं से बचा लीजिये।आँख परकी पट्टी उतारकर अपने बच्चे की आँख में झाँकर देखिये,वहाँ वही मिलेगा,जिससे यह समाज विज्ञानिक समाज बनकर खुशहाल होगा।जगिये,उठिये,चलिए,बढ़िए,इस बीच बहकने से बचिए।।।।

No comments:

Post a Comment