मेरे अंदर बहुत कुछ
है जला हुआ,
जिसे मैं फिर से देखना चाहता हूँ
चाहता हूँ,
भाँप बन चुकी वह बून्द,फिर से ओस बन जाए।
मैं चाहता हूँ वह जले हुए ख्वाब दोबारा तरोताज़ा हों जाएँ।
मुझमे जो तुम मर चुकी हो,
दोबारा मेरे कन्धों पर हाथ रख कर।
मेरे हाथ से वह गुलज़ार की माचिस छीनकर दूर,बहुत दूर फ़ेंक दो,
जिससे मैंने अपने अंदर का बहुत कुछ जला डाला है,
मैं अब सबको ज़िंदा रखना चाहता हूँ।
मैं जिस्म को यादो का कब्रिस्तान नही बनते देख सकता।
मैं जले हुए ख्वाबों के श्मशान से दूर,
बहुत दूर,एक खूबसूरत हर भरा बाग़ ही तो हूँ,
जहाँ तुम सब रोज़ आती हो,रोज़ आती हो,रोज़ आती है
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, September 25, 2017
माचिस
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hafeezkidwai
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