Wednesday, October 11, 2017

एक मुलाकात उमराव से

कल रात उमराव आई थीं।पूछ रहीं थी लखनऊ की शाम अब कैसी होती है।हमने भी कहा,वाह, जाते जाते खुद सारी शाम अपने साथ लेती गईं और अब पूछ रहीं हैं की शाम कैसी होती है।
अरे उमराव आपके जाते ही लखनऊ से सिर्फ सबेरा ही देखा है।हमारे हिस्से की शाम का अँधेरा तो आपने अपनी कब्र में क़ैद कर रखा है।हम रोज़ सुबह उठते हैं और अब दिन रात अपनी सुबह ही बनाने में लगे रहते हैं।

हमे रोज़ अव्वल आने के लिए लड़ना पड़ता है।ए उमराव इस जीतने की दौड़ में हम सबकी शाम खो गई है।गोमती का पानी छुए अरसा हुआ है,अगर हो सके तो उमराव हमारी वह शाम लौटा दो,जो तुम्हारी आँखों से होते हुए,जिस्म की किसी सिलवटों में कहीं खो गई है।

आखरीबार जब उस रोज़ सरे शाम जब तुमने बेदर्दी से चराग़ बुझाया था,तो किसे पता था की यह हमारी मुस्कुराहट पर तुमने हाथ रख दिया है।उस रोज़ बिखरने वाला अँधियारा हम सबपर रौशनी बनकर तारी हो गया है।हो सके तो हमे थोड़ा ठहरना बतला दो उमराव,हम अब भागते भागते ठहरना भूल चुके हैं....

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