Saturday, October 14, 2017

आखरी नौकर

एक के बाद एक खादिम दम तोड़ता रहा।कोई ने तीस साल ख़िदमत की तो कोई ने साठ साल,सब मर खप गए।कोठी का वह आखरी नौकर अपने छप्पर में लेटा मौत का इंतज़ार कर रहा था।

ज़मींदार से उसे बिना देखे रहा नही गया और कोठी से बाहर लाठी के सहारे क़दम रखा।खादिम के चबूतरे तक पहुँचते पहुँचते ज़मीदार की साँस फूलने लगी।बड़ी मुश्किल से पकड़ाकर वह उसके छप्पर तक लाए गए।खादिम ने आँखों से खुद के उठ कर सलाम न कर पाने का ग़म बहा दिया।ज़मीदार ने हाथ उठाकर लेटे रहने को कहा।

उसके सामने बैठकर उँगलियों की पोर पर चार दर्जन नौकरों को याद करते हुए ज़मीदार थक रहे थे की फलाने भी चला गया,वह भी मर गया,वह भी खत्म हो गई और फिर लेटे हुए खादिम से कहा अब हमे अकेला छोड़कर तुम भी जा रहे हो।

खादिम ने मुस्कुराकर कहा,हुज़ूर आपको भी तो जाना है।हम तो ठहरे खादिम।आपसे पहले जाकर जन्नत में आपके आने का इंतेज़ाम हम ही लोगों को तो देखना है।हमसे पहले वाले मरकर वहाँ पहुँच आपके लिए कोठी बना रहे हैं, हमे भी अब छोड़िये मालिक,तो वहाँ जाकर ज़मीन लीप दूँ,ताकि आप उसपर आहिस्ता आहिस्ता चलकर आए और चीख़ कर कहें की मेरी चाय कहाँ है गुलाम।

ज़मींदार ने उसे चुप कराया की अगर तुमसे या उन सबसे वहाँ भी काम ही लिया गया तो काहे की जन्नत।सच तो यह है की हमे पहले जाकर तुम सबों का इंतेज़ाम करना चाहिए था मगर नही,मेरी जन्नत तो यहीं थी,जब तुम साथ थे।तुम सबने मेरी ज़िन्दगी को जन्नत बना रखा था।एक एक मरकर मुझे एहसास करा रहे हो की तुम थे,तभी तो हम थे।अब तो मैं अकेलेपन की दोज़ख में तुम सबके क़िस्से ही गुनगुनाता रहूँगा धूप में लेटा लेटा..

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