जिस तरह किसान को अपनी फसल देख कर ख़ुशी होती है।माँ को अपने बेटे को जवान होते देख ख़ुशी होती है।गर्लफ्रेंड को अपने ब्वॉयफ्रेंड को पैसे खर्च करते देखते हुए होती।जिस तरह अबोध बालक को अपनी गर्ल फ्रेंड का आँखे बन्द करके बेतहाशा हँसते देखना ख़ुशी देता है। बाबा भारती को अपने घोड़े को देख ख़ुशी होती थी।वही ख़ुशी आजकल डॉक्टर को अपने अस्पताल को देख कर होती है।
लाइन से पड़े बेड।बेड पर छाय बिछाए मरीज़,किसी लहलहाती फसल से कम हैं क्या।कुछ मरीज़ फर्श पर लेटे हैं तो कुछ बेंचों पर पड़े हैं जैसे धान की फ़सल, ज़्यादा धान के वज़न से खेत में लोट गई हो।डायग्नोस्टिक सेंटर के क्या कहने।मारे ख़ुशी के इनकी रिपोर्ट उनको और उनकी रिपोर्ट इनको बाँटे हैं।एक्सरे को सिटी स्कैन तो सिटी स्कैन को एक्सरे में बदले हैं।अजब मन्ज़र है सहालग का।
बेचारे एम्बुलेंस के ड्राइवरों की औरते महीनो से मियाँ का इंतज़ार कर रही हैं।मियाँ हैं की बस ढुलाई चालू है।जिस घर के सामने एम्बुलेंस रोकी,वहाँ से दो चार लाद लाए।फेफड़ो का मरीज़ वोह बुढ्ढा खाँस खाँस थका जा रहा मगर एम्बुलेंस में जगह नही पाया।जो पूछ डेंगू,चिकुनगुनिया की है वोह टीबी की कहाँ है।घाटे का सौदा।इस सहालग के सीज़न में निकम्मा से निकम्मा डॉक्टर भी पनीर और मटन का इंतज़ाम कर ले रहा है।जब जब अस्पताल जा रहा हूँ,तब तब डॉक्टर मन ही मन बल्लियों उछलते नज़र आ रहे हैं।मज़ा तो तब आया जब एक डॉक्टर के लड़के ने स्कूल से लौटते ही कहा,पापा इस बार अगर सिंगापुर नही जा पाए तो कभी नहीं जा पाए।पापा ने भी बच्चे को समझाया बस भगवान से प्रार्थना करो दो महीने और सहालग बनी रहे।सबकी चाँदी है।
मच्छर ख़ून पीकर खुश।डायग्नोस्टिक सेंटर ख़ून निकाल कर खुश और डॉक्टर ख़ून बिना पिए खुश।।।।।यही तो प्रकृति है सबका न्याय।जो नही खुश उनमे से क़रीब पन्द्रह को कब्रिस्तान पहुँचा चुके हैं।कब्र खोदने वाले वहाँ खुश।बैकुंठधाम में पंडे, पण्डित खुश।इतना धुआँ कम ही देखा है श्मशान में।फॉगिंग,सफ़ाई, छिड़काव के नाम पर लूट खसोट से शासन खुश।एक सब्जेक्ट की बीमारी और मौत कितनो को खुश कर रही।मौत भली चीज़ है।श्री डेंगू,श्री श्री चिकुनगुनिया,महाराज स्वाइन फ्लू और सिड़ी-सड़ी व्यवस्था को ज़िंदाबाद।
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